साईकिल से तय किया 14 राज्यों का सफर

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‘यदि मन में हौसला अटल हो तो कोई मंजिल दूर नहीं होती’ इस बात को आज साबित कर दिखाया है इंदौर के प्रदीप कुमार सेन ने| मन में  अपार उत्साह और कुछ कर दिखाने का हौसला प्रदीप के मन में शुरू से ही था | अपने कॉलेज के दिनों से ही प्रदीप डांस और एक्टिंग में भागीदारी किया करते थे और कला के हर क्षेत्र में अपने को आगे रखते थे। अपने को सबसे अलग और आगे रखने का उनका यह जुनून उस दिन भी कमजोर नहीं हुआ, जब उन्होंने  ट्रेन हादसे में अपना एक पैर खो दिया।

प्रदीप बताते हैं कि हादसे के बाद मेरी ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई।  लोग मुझे असहाय समझने लगे और मेरे प्रति सहानुभूति व्यक्त करने लगे | सबसे ज्यादा दुखद मेरे लिए यह था कि मेरे नाम के आगे दिव्यांग लगा दिया गया।  मैं  कभी खुद को ऐसा नहीं देखना चाहता था इसलिए मैंने खुद को ही चुनौती दी और नकली पैर के सहारे निकल पड़ा | मैंने वह हर काम किया, जो  मुझे मेरे दिव्यांग होने पर चैलेंज करता था।  नवंबर 2017 में मैंने 15 हजार किलोमीटर का लक्ष्य लेकर इंदौर से साइकिलिंग की शुरूआत की। इस दौरान मैं मध्यप्रदेश से होकर महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश होता हुआ तेलंगाना पहुंचा।  यहां से दोबारा महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल और बिहार से अब यूपी आया हूं। उत्तरप्रदेश के इटावा शहर में मैंने 10 हजार किमी पूरे कर लिए हैं। अब मैं यहां से हरियाणा और फिर दिल्ली जाऊंगा।

यह पहली बार है जब किसी दिव्यांग ने हजारों किमी साइकिलिंग की है । रविवार को यूपी के इटावा में उन्होंने 10 हजार किमी यात्रा पूरी कर गोल्डन बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड का  दावा  किया।  वर्ल्ड रिकॉर्ड की औपचारिक घोषणा अभी नहीं हुई है| उन्होंने प्रतिदिन 100 से 150 किमी साइकिलिंग की| प्रदीप के अनुसार, उनके लिए यह सफ़र कई मुश्किलों से भरा हुआ था। कई राज्यों में उन्हें ख़राब मौसम का सामना करना पड़ा तो कहीं ख़राब सड़कों का।  छत्तीसगढ़ के एक गांव में उन पर बंदरों ने हमला कर दिया, जिससे वे घायल हो गए | घायल अवस्था में भी  उन्होंने  20 किमी तक साइकिलिंग की और फिर स्थानीय पुलिस की मदद से अपना इलाज करवाया।

अपने कंधे पर 30 किलो वजनी बैग टांगकर और कई घंटे भूखे-प्यासे रहकर उन्होंने यह सफ़र तय किया। प्रदीप गूगल मैप की सहायता से रास्ते और मौसम की जानकारी प्राप्त करते हैं|  प्रदीप सात महीने में भारत के 14 राज्यों का सफ़र तय कर चुके हैं। प्रदीप अपना एक पैर गवां देने के बाद भी खुद को दिव्यांग नहीं समझते। उनका मानना है कि हर कोई दिव्यांग सब कुछ कर सकता है| यदि हम में हौसला है तो आप अपनी हर मंजिल को प्राप्त कर सकते हैं।

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