Hindi Kahani : और हार गई श्रेष्ठता

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एक युवक को अपनी धनुर्विद्या पर बहुत घमंड था और वह अपने आपको श्रेष्ठ धनुर्धर समझता था। उसने एक बार एक संत को, जो स्वयं धनुर्विद्या के ज्ञाता थे, को मुकाबले की चुनौती दी। पहले युवक ने अपने कौशल का प्रदर्शन किया और एक तीर चलाकर उसको निशाने पर लगाया और दूसरे तीर से उस पहले तीर को चीर दिया। इसके साथ ही अहंकार से संत की ओर देखकर कहा कि ‘ क्या आप ऐसा कर सकते हैं ?’

संत युवक के सवाल से जरा भी विचलित नहीं हुए और उन्होंने युवक को अपने साथ आने का इशारा किया। युवक और संत दोनों चलते-चलते एक पहाड़ पर पहुंच गए। युवक को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर संत चाहते क्या हैं? दोनों चलते-चलते ऐसी जगह पर पहुंच गए जहां पर दो पहाड़ों के बीच एक खाई थी और उस खाई पर दोनों पहाड़ों के आरपार जर्जर रस्सी का पुल बना हुआ था। तेज हवाएं चल रही थीं और कमजोर पुल तेजी से हिल रहा था। ऐसे में संत पुल पर चलकर उसके बीचो बीच गए और उन्होंने अपने धनुष से निशाना साधते हुए लक्ष्य पर छोड़ दिया। संत ने एक पेड़ पर निशाना लगाया था जो बिल्कुल सटीक लगा।

अब संत ने युवक को ऐसा ही करने को कहा। युवक जैसे-तैसे पुल पर आगे बड़ा और कुछ दूर चला ही था कि वह पुल के हिलने, हवाओं के झोंके और पुल की हालत देखकर वह बेहद घबरा गया। वह दो कदम चलते ही कांपने लगा और पसीने से तरबतर हो गया। ऐसे में उसका धनुष भी हाथ से छूटकर खाई में समा गया। युवक की ऐसी हालत देखकर संत ने उसको अपने पास बुलाया और कहा कि ‘ बेशक तुम श्रेष्ठ धनुर्धर हो, लेकिन अपने मन पर तुम्हारा नियंत्रण नहीं है, जो किसी तीर को निशाने से भटकने नहीं देता है। ‘साभार |

अभिषेक

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