श्मशान का महत्व

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बात उस वक्त की है जब फकीरी अपना लेने के बाद इब्राहीम शहर से दूर एर झोपड़ी बनाकर रहने लगे। शहर और उसके आसपास के इलाकों में उसकी बड़ी ख्याति थी। इसलिए शहर से दूर होते हुए भी उनके पास आने-जाने वालों का तांता लगा रहता था। इतना ही नहीं उस इलाके के अनजान लोग भी राह चलते इब्राहीम के पास रुकते थे। उनमें से कुछ ऐसे भी थे जो उनको पहचानते भी नहीं थे, लेकिन इब्राहीम का स्वभाव उनको बरबस रोक लेते थे । आने वालों में ऐसे व्यक्ति भी थे जो उनसे बस्ती का रास्ता पूछते थे। वे सामने की ओर इशारा कर देते थे।

जब कोई पूछता कि ‘क्या कोई दूसरा रास्ता बस्ती की ओर जाता है?’ तो वह कहते ‘नहीं यही रास्ता बस्ती की ओर जाता है।’ लेकिन जब वे लोग उनके बताए रास्ते पर जाते थे तो शमशान पहुंच जाते थे। लोगों को इस बात पर काफी खीज होती थी कि फकीर ने उनको गलत रास्ता बता दिया। कुछ लोग चुपचाप दूसरा रास्ता तलाशने में लग जाते थे। कुछ मन ही मन फकीर को कोसते हुए वापस लौट आते या दूसरे सही रास्ते की खोज में लग जाते। लेकिन एक दिन एक मुसाफिर को काफी गुस्सा आया कि फकीर इब्राहीम ने उनको गलत रास्ता बताया। मुसाफिर लौटकर आया और फकीर को खूब खरी-खोटी सुनाई। वह आदमी उनको लगातार भला-बुरा कहे जा रहा थी। जब वह थक गया तो चुप हो गया।

उसके चुप हो जाने पर इब्राहीम शांति से उससे बोले, ‘अरे भाई, क्या मरघट बस्ती नहीं है? तुम जिसको बस्ती कहते हो वहां रोजाना एक न एक मौत होती रहती है। तब वह घर क्या उजड़ नहीं जाता? उन उजड़े घरों से ही मरघट में बड़ी बस्ती बन गई है। दूसरी बस्तियों में तो लोग उजड़ते बसते रहते हैं, लेकिन यहां तो एक बार जो बस गया वह हमेशा के लिए बस जाता है। उसको वहां से हटने की जरूरत नहीं होती है। इसलिए क्या यह बस्ती नहीं हुई? इसलिए मैने तुमको बस्ती का सही रास्ता बतलाया।’ यह सुनकर मुसाफिर चुप हो गया और आगे अपनी मंजिल की ओर बढ़ गया।

अभिषेक

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