भरत नहीं बैठते थे अयोध्या के सिंहासन पर

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श्रीराम राजा दशरथ के चार पुत्रों सबसे बड़े थे और उनकी माता का नाम कौशल्या था | राम के प्रिय अनुज भरत दशरथ की प्रिय रानी कैकेयी के पुत्र थे | श्रीराम कथा में इन दोनों के किरदार की भूमिका हम सभी जानते है | राम के राज्याभिषेक से ठीक पहले कैकयी ने वचन में बंधे राजा दशरथ के सामने भरत को राजा बनाने की मांग की और राम के लिए वनवास माँगा | इस सब विवाद के समय भरत अयोध्या में नहीं थे | वे उस समय ननिहाल गए हुए थे |

रानी के आगे हार मानते हुए राजा दशरथ ने राम को वनवास दे दिया | बाद में जब भरत अयोध्या आये तो यह समाचार सुन कर बड़े दुखी हुए | वे राम को वन में मनाने भी गए, किन्तु मर्यादा और पिता के वचन को निभाने की बात कहते हुए राम नहीं माने| तभी उन्होंने राम की खड़ाऊं( चरण पादुका ) उठाई और अयोध्या आ कर उन्हें राजगद्दी पर रख दिया |

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राज्य भरत ने चलाया मगर वे राज सिंहासन पर नहीं बैठे| राम के वनवास के 14 वर्ष के दौरान भरत भी अयोध्या के पास नंदीग्राम में तपस्वी जीवन जीने लगे और भरत ने दुनिया को भाई प्रेम का पाठ पढ़ाया | आज जब भी राम कथा कही सुनी जाती है, उसमे राम, लक्ष्मण, सीता के साथ भरत चरित्र को प्रमुखता से सुनाया जाता है | भरत ने भाईचारे और त्याग की वो मिसाल पेश की जो युगों-युगों तक मानव का मार्गदर्शन करती रहेगी |

-अभिषेक

संत हरिदास और चैतन्य महाप्रभु का प्रसंग

गौतम बुद्ध का प्रवचन

दृढ संकल्पी लिंकन

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