Swami Vivekananda के जीवन का प्रेरक प्रसंग

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एक दिन एक साधु स्वामी विवेकानंद ( Swami Vivekananda) के पास आया| वह चिंतित प्रतीत हो रहा था| अभिवादन करने के उपरांत उसने अपनी व्यथा स्वामी जी को सुनाई, “स्वामी जी! मुझे शांति नहीं मिलती| मैंने सब कुछ त्याग दिया है| मोह माया के बंधनों से मुक्त हो गया हूँ| फिर भी मन सदा भटकता रहता है| एक दिन मैं अपने एक गुरू के पास गया| मेरी व्यथा सुनकर उन्होंने मुझे एक मंत्र दिया और कहा कि उसके जाप से मेरा मन शांत हो जायेगा| मैंने उस मंत्र का जाप करने पर भी मुझे शांति नसीब नहीं हुई| मैं बहुत परेशान हूँ स्वामी जी| आप कुछ समाधान बताइये|” कहते हुए उस साधु की आँखें नम हो गई|

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स्वामी जी बड़े ध्यान से उसकी बातें सुन रहे थे| बात समाप्त होने पर उन्होंने पूछा, “मान्यवर! क्या आप वास्तव में शांति चाहते है?” “जी स्वामीजी! इसी आस में मैं आपके पास आया हूँ|” साधू ने उत्तर दिया|

“तो ठीक है| मैं तुम्हें शांति प्राप्त करने का सरल मार्ग बताता हूँ| यह जान लो कि सेवा धर्म महान है| घर से निकलो| बाहर जाकर भूखों को भोजन दो| प्यासों को पानी पिलाओ| विद्यारहितों को विद्या दो| दीन, दुखियों, दुर्बलों और रोगियों की तन, मन एवं धन से सेवा करो| सेवा द्वारा मनुष्य का अंतःकरण शांत होता है| ऐसा करने से आपको सुख और शांति प्राप्त होगी|”

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स्वामी विवेकानंद ( Swami Vivekananda) की बात साधु के मन में बैठ गई| वह एक नए संकल्प के साथ वहाँ से चला गया| उसे समझ आ गया था कि मानव जाति कि निःस्वार्थ सेवा से ही मनुष्य को शांति प्राप्त हो सकती है|

अभिषेक

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