वीरता, साहस और तेज़ बुद्धि ने बनाया ‘शिवाजी’

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शिवाजी का जीवन संघर्ष से भरा हुआ है। शिवाजी प्रभावशाली कुलीनों के वंशज थे। उस समय भारत पर मुस्लिम शासन था। शिवाजी को बचपन से ही पिता के स्नेह से वंचित रहना पड़ा था। उनकी पैतृक जायदाद बीजापुर के सुल्तान द्वारा शासित दक्कन में थी। शिवाजी ने बचपन से ही दुःख और पीड़ा का सामना किया। उन्होंने मुस्लिमों द्वारा किए जा रहे दमन और धार्मिक उत्पीड़न को इतना असहनीय पाया कि 16 वर्ष की आयु तक पहुंचते-पहुंचते उन्हें विश्वास हो गया कि हिन्दुओं की मुक्ति के लिए ईश्वर ने उन्हें नियुक्त किया है। आगे चलकर शिवाजी वीर प्रतापी राजा बने। आइये, जानते हैं शिवाजी के बचपन की कुछ वीरता की बातें।

शिवाजी हिन्दू धर्म के रक्षक थे। उन्होंने हिन्दुओं की पूजनीय गोमाता की रक्षा के लिए कई कार्य किए। उनकी विधवा माता, जो स्वतंत्र विचारों वाली हिन्दू कुलीन महिला थी, ने जन्म से ही उन्हें दबे-कुचले हिंदुओं के अधिकारों के लिए लड़ने और मुस्लिम शासकों को उखाड़ फेंकने की शिक्षा दी थी। शिवाजी का शिवनेरी के किले में सन 1630 में जन्म हुआ था।‘मालदार खान’ ने शिवाजी को बाल्य अवस्था में बंदी बनाकर रखना चाहा था क्योंकि वह दिल्ली के बादशाह को खुश करना चाहता था, लेकिन उसका यह दुष्ट प्रयत्न सफल नहीं हो सका। शिवाजी ने सैनिक शिक्षा भी हासिल की थी, लेकिन एक समय पर उनकी परिस्थिति बहुत बिगड़ गई थी। इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी उस वीर की माता ने अपने पुत्र की सैनिक शिक्षा में कमी नहीं आने दी।

जब शिवाजी 12 वर्ष के थे, तब उन्होंने गौरक्षा के लिए एक कसाई का वध कर दिया था। सन 1674 तक शिवाजी ने उन सारे प्रदेशों पर अधिकार कर लिया था, जो पुरन्दर की संधि के अंतर्गत उन्हें मुग़लों को देने पड़े थे। महाराष्ट्र में स्वतंत्र हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के बाद शिवाजी ने अपना राज्याभिषेक करना चाहा, परन्तु ब्राह्मणों ने उनका घोर विरोध किया। शिवाजी के निजी सचिव बालाजी आवजी ने इसे एक चुनौती के रूप में लिया और उन्होंने ने काशी में गंगाभ नामक एक ब्राह्मण के पास तीन दूतों को भेजा, किन्तु गंगाभ ने प्रस्ताव ठुकरा दिया, क्योंकि शिवाजी क्षत्रिय नहीं थे।

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