भारत की महिला इंजीनियर ने रचा इतिहास

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वो कहते हैं न कि जिस राह पर कोई भी न चल रहा हो, उस राह पर मुश्किलें तो बहुत होती हैं, लेकिन ऐसी राहें अक्सर आपको ऊंचाई पर लेकर जाती हैं| वहीं भीड़ का हिस्सा बनना बेहद आसान है, पर एक ऐसी राह चुनना जो सबसे अलग हो, यह सिर्फ जुनूनी और हिम्मती लोगों का काम है| भारतीय मूल की दमयंती गुप्ता एक ऐसी शख्सियत हैं, जो तमाम बाधाओं के बावजूद फोर्ड कंपनी की पहली डिग्रीधारी महिला इंजीनियर बनने में कामयाब हुईं|  दमयंती ने फोर्ड के लिए कई सालों तक काम किया और उनकी कहानी किसी प्रेरणा से कम नहीं है| टाइम मैगजीन ने भी पुरुष प्रधान इंडस्ट्री में इकलौती महिला दमयंती की उपलब्धियों और उनके हौसले को सलाम करते हुए उन पर कवर स्टोरी छापी थी|

दमयंती पुराने दिनों की याद करते हुए बताती हैं, “मैं ब्रिटिश भारत में एक छोटे से शहर में पैदा हुई थी|  देश में विश्व के इतिहास के सबसे खूनी विभाजन की कहानी लिखी जा रही थी| 1947 में ब्रिटिशर्स ने आखिरकार भारत छोड़ दिया, लेकिन भारत-पाकिस्तान का विभाजन हो गया| जहां मेरा परिवार रहता था, वह पाकिस्तान में आ गया, लेकिन यह सब कुछ इतना आसान नहीं था| हर तरफ दंगे हो रहे थे और उस समय मेरी उम्र केवल 5 साल थी| हमें आधी रात को कराची के तटीय शहर की ओर भागना पड़ा| उसके बाद हमें मुंबई के लिए कार्गो शिप पर बैठा दिया गया| मुझे याद है कि मेरी मां गोपीबाई हिंगोरानी ने केवल चौथी कक्षा तक ही पढ़ाई की थी, लेकिन उन्होंने मुझसे कहा कि वे मुझे कुछ ऐसा दिलाएंगी, जो कोई न छीन सके, यानी शिक्षा| अगला दशक हमने भले ही शरणार्थियों की तरह गुजारा, लेकिन मेरी मां ने अपना वादा निभाया|

उन्होंने पहली बार इंजीनियर शब्द 13 साल की उम्र में सुना था| भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू उनके छोटे से शहर में पहुंचे थे| उन्होंने कहा था, “ब्रिटिश शासन के 200 साल बाद भी भारत के पास कोई इंडस्ट्री नहीं है, हमें इंजीनियर्स की जरूरत है| मैं केवल लड़कों से बात नहीं कर रहा हूं, मैं लड़कियों से भी ये कह रहा हूं|” इतना सुनते ही मैंने तय कर लिया कि मुझे अपनी जिंदगी में क्या करना है| मैंने सोचा कि अब चाहे कुछ भी हो जाए,  मैं इंजीनियर ही बनूंगी| उस दिन में अपने घर गई और मैंने मां से कहा कि मैं पहली महिला इंजीनियर्स में से एक बनूंगी|

मैं पहली महिला थी, जिसने भारत के इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन लिया| इसमें कोई दो राय नहीं कि यह बहुत ही चुनौतियों से भरा था| पुरुषप्रधान व्यवस्था के बीच कैंपस में एक भी लेडीज़ वॉशरूम तक नहीं था| मैं 1 मील की दूरी तय करके अपनी बाइक से वॉशरूम जाती थी| हालांकि कुछ महीनों के भीतर डीन को एहसास हो गया कि मैं यहां टिकने के इरादे से आई हूं इसलिए उन्होंने एक लेडीज रूम बनवा दिया|

19 की उम्र में मैंने हेनरी फोर्ड की बायोग्राफी पढ़ी और सपने देखने लगीं कि एक दिन मैं भी इसी कंपनी में काम करूंगी| भारत में कॉलेज की पढ़ाई खत्म करने के बाद मेरे पैरेंट्स ने अपनी ज़िंदगीभर की कमाई अपनी बेटी के सपनों को पूरे करने में लगा दी| यह मेरे परिवार के लिए बहुत कठिन था, लेकिन मेरी मां बहुत ही दूरदर्शी थीं|

उनकी सोच थी कि यदि एक बच्ची पढ़-लिख गई तो इससे पूरे परिवार का भविष्य बदल जाएगा, वे बिल्कुल सही थीं| बाद में मैंने अपने छोटे-भाई-बहनों की मदद की और अपने पैरेंट्स को अमरीका ले आई| मैं जनवरी 1967 में मोटर सिटी डेट्राइट पहुंची| मेरे पास न तो स्नो बूट्स थे, न गर्म जैकेट और न ही कार| जब मैंने पहली बार फोर्ड में एप्लाई किया तो मुझे रिजेक्ट कर दिया गया, पर मैंने हार नहीं मानी| मैंने कुछ महीनों बाद फिर से कोशिश की| कंपनी का एचआर हैरत में था| उन्होंने मेरे रेज्यूमे को देखा और कहा कि आप इंजीनियरिंग जॉब के लिए अप्लाई कर रही हैं, लेकिन हमारे यहां तो कोई महिला है ही नहीं| मैंने उनसे कहा, मैं यहां हूं, यदि आप मुझे मौका नहीं देंगे तो आपकी कंपनी में कैसे कोई महिला कर्मचारी होगी| यह काम कर गया और मैं फोर्ड मोटर कंपनी में हायर की गई पहली डिग्रीधारी महिला इंजीनियर बन गई|

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