Hindi Kahani : एक हार और सब ख़त्म, ऐसा नहीं है

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अमित मध्यम वर्गीय परिवार का आज्ञाकारी और मेहनती लड़का था | कॉलेज में दाखिला लेने के बाद वो बदलने लगा| पढाई में अब उसका मन नहीं लगता था और वो अपने माँ-बाप की सुनता भी नहीं | झूठ बोल कर पैसे उड़ाना, बुरी संगती, फिजूलखर्ची सिनेमा, धूम्र-पान अब उसकी मुख्य आदते हो गई थी|समझाइश देने पर कहता की ” मुझे अच्छे-बुरे की समझ है , मैं भले ही ऐसे लड़को के साथ रहता हूँ पर मुझ पर उनका कोई असर नहीं होता|अब परीक्षा के दिन आ गए , वह एक विषय में फेल हो गया और मानसिक तौर पर टूट गया| यह बात परिवारजन को और भी चिंता में डाल रही थी| अमित अब बस खोया खोया रहता था| स्कूल के प्रिंसिपल को यकीन नहीं हुआ की उनका प्रिय छात्र इन हालातों में हैं| उन्होंने अंतिम को घर अपने बुलाया | ठण्ड के दिन थे तो प्रिंसिपल साहब बाहर बैठे अंगीठी ताप रहे थे| अमित भी उनके पास जाकर बैठ गया| लम्बे मौन के बाद प्रिंसिपल साहब उठे और चिमटे से कोयले के एक धधकते टुकड़े को निकाल मिटटी में डाल दिया|

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यह देख अमित बोला , ” प्रिंसिपल साहब , आपने उस टुकड़े को मिटटी में क्यों डाल दिया , ऐसे तो वो बेकार हो गया , अगर आप उसे अंगीठी में ही रहने देते तो अन्य टुकड़ों की तरह वो भी गर्मी देने के काम आता| प्रिंसिपल साहब मुस्कुराये और बोले , ” बेटा , कुछ देर अंगीठी में बाहर रहने से वो टुकड़ा बेकार नहीं हुआ , लो मैं उसे दुबारा अंगीठी में डाल देता हूँ….” और ऐसा कहते हुए उन्होंने टुकड़ा अंगीठी में डाल दिया| अंगीठी में जाते ही वह टुकड़ा वापस धधक कर जलने लगा और पुनः गर्मी प्रदान करने लगा|“कुछ समझे अमित| प्रिंसिपल साहब बोले , ” तुम उस कोयले के टुकड़े के समान ही तो हो, पहले जब तुम अच्छी संगती में रहते थे , मेहनत करते थे , माता-पिता का कहना मानते थे तो अच्छे नंबरों से पास होते थे , पर जैस वो टुकड़ा कुछ देर के लिए मिटटी में चला गया और बुझ गया , तुम भी गलत संगती में पड़ गए और परिणामस्वरूप फेल हो गए, पर यहाँ ज़रूरी बात ये है कि एक बार फेल होने से तुम्हारे अंदर के वो सारे गुण समाप्त नहीं हो गए… जैसे कोयले का वो टुकड़ा कुछ देर मिटटी में पड़े होने के बावजूब बेकार नहीं हुआ और अंगीठी में वापस डालने पर धधक कर जल उठा|

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ठीक उसी तरह तुम भी वापस अच्छी संगती में जाकर , मेहनत कर एक बार फिर मेधावी छात्रों की श्रेणी में आ सकते हो| अब अमित अपने गुरु की बात समझ चूका था उसने मन में निश्चय किया की वह फिर से वही अमित बनकर दिखायेगा जिस पर प्रिंसिपल साहब और उसके परिजनों को गर्व था | कई बार हम गलत सांगत में पद जाते है और गलतियां कर बैठते है लेकिन जीवन यहाँ से ख़त्म नहीं हो जाता | निराशा को अपने ऊपर हावी न होने दी और फिर नई शुरुआत के साथ आगे बढे |

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