Hindi Kahani : अहंकार से संत तक की यात्रा

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यह कहानी है, एक अहंकारी राजा के संत बन जाने की | एक सम्राट रात्रि में अपने कक्ष में सोया था कि अचानक उसे लगा मानों छत पर है | सम्राट ने कहा, ‘कौन है’? चोर हो या लुटेरे? उपर से उत्तर आया, चुप चाप सो जाओ, न मैं चोर हूं, न मैं लुटेरा हूं, मेरा हाथी खो गया है, उसी को ढूंढ रहा हूं|सम्राट ने उसे पागल समझा | मगर इसके बाद सम्राट रात भर सो नहीं पाया| सुबह उसने पहरेदारों को नगर में उस व्यक्ति को खोजने को कहा|

दोपहर में राजदरबार में पहरेदार आए| उन्होंने सम्राट से कहा, राजमहल के बाहर बलवान व्यक्ति जो आत्मविश्वास से भरा है उधम कर रहा है| उसे काबू करना बेहद मुश्किल भरा रहा | वह राजमहल को धर्मशाला बताता है, कहता है इस धर्मशाला में कुछ दिन रुकना है| सम्राट को लगा, हो न हो यह वही आदमी है जो रात में हाथी ढूंढ रहा था| सम्राट ने आदेश दिया कि उसके बंधन खोलकर राजसभा में लाया| सम्राट ने उसके आते ही पूछा कि तुम राजमहल को धर्मशाला कहते हो?

व्यक्ति ने उत्तर दिया बदतमीज तो आप हैं, याद करें, जब आप यहां नहीं थे तो इस राजसिंहासन पर कोई और बैठता था| जब वह भी नहीं था तब इस सिंहासन पर कोई और बैठता था| अब जब मैं फिर कभी आउंगा तो इस सिंहासन पर कोई और बैठा होगा| अब तुम ही बताओं यह राजमहल है या धर्मशाला? इस सवाल के पीछे छिपे के मुख्य रहस्य को समझकर राजा ने तुरंत मोह-माया त्याग दी | उस व्यक्ति के उपदेश से प्रभावित वह राजा एक महान संत के रूप में जाना गया | अभिषेक |

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