पन्नी बीनने वाले के बेटे ने छुआ शिखर…

0

कहते हैं कि सफलता किसी सुविधाओं और संसाधनों की मोहताज नहीं होती| कोशिश करने वाले एवं खुद पर विश्वास रखने वालों के लिए कोई भी काम मुमकिन नहीं होता| ऐसा ही कुछ पन्नी बीनने वाले एक व्यक्ति के बेटे ने कर दिखाया है| बहुत ही गरीब और आर्थिक परेशानियों के बीच पले-बढ़े आशाराम चौधरी ने वह हासिल कर लिया है, जो कभी-कभी सुविधाओं के बीच रहने वाले संपन्न परिवार के बच्चे भी नहीं कर पाते हैं|

दरअसल, ‘ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज’ की परीक्षा, जिसे देश में सबसे कठिन माना जाता है| इस परीक्षा का आयोजन दो महीने पहले हुआ था, जिसमें 4 लाख परीक्षार्थियों ने भाग लिया था| इसमें आशाराम चौधरी ने ओबीसी श्रेणी में 2 लाख विद्यार्थियों के बीच 141वीं रैंक हासिल की है, जिससे अब वे एम्स में मेडिकल की पढ़ाई करेंगे|

देवास से लगभग 40 किमी दूर विजयागंज मंडी में जन्मे आशाराम के पिता रणजीत चौधरी पन्नी बीनकर और खाली बोतलें जमा कर अपने घरवालों का पेट भरते हैं और मां गृहिणी हैं| अब आशाराम जोधपुर के मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस करेगा और डॉक्टर बनेगा| आशाराम का एक छोटा भाई है, जो नवोदय विद्यालय से कक्षा 12वीं की पढ़ाई कर रहा है|

आशाराम को कक्षा छठी में जवाहर नवोदय विद्यालय चंद्रकेशर में दाखिला मिल गया था| वहां 10वीं तक की पढ़ाई करने के बाद आशाराम ने दक्षिणा फाउंडेशन पुणे की प्रवेश परीक्षा दी, जिसमें भी उन्हें दाखिला मिल गया| इसके बाद 11वीं-12वीं के साथ ही मेडिकल की तैयारी शुरू कर दी| इस वर्ष आशाराम ने एम्स की परीक्षा पास करके अपने परिवार का नाम रोशन किया| आशाराम का इसी साल नीट में चयन हुआ| वे किशोर वैज्ञानिक प्रोत्साहन योजना में रिसर्च साइंटिस्ट भी चुने जा चुके हैं| जर्मनी के सिल्वर जोन फाउंडेशन संस्थान में भी उनका चयन हो चुका है, जिसमें 332वीं इंटरनेशनल रैंक उन्हें हासिल हुई|

आशाराम को शिक्षा के लिए सरकारी योजनाओं की जानकारी तो थी पर उनका बीपीएल कार्ड बनाने के लिए रिश्वत मांगी गयी| ऐसे में देवास के तत्कालीन एडीएम डॉ. कैलाश बुंदेला का सहयोग मिला और उनको इस कार्य में  सहायता मिल पाई |जिसके कारण वे पुणे के इंस्टिट्यूट में प्रवेश ले पाए और एम्स में सफल हुए |

Share.