अटल बिहारी वाजपेयी की टॉप 5 कविताएं

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भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और भारतरत्न अटल बिहारी वाजपेयी हमें अलविदा कह चुके हैं, लेकिन उनकी यादें हमेशा अटल रहेंगी| वे सिर्फ एक अच्छे राजनेता ही नहीं थे बल्कि एक महान कवि, एक महान मागदर्शक भी थे| राजनीति में उन्हें कई लोग अपना गुरु, अपना भगवान मानते हैं| अटलजी अपने भाषण में हिन्दी के अच्छे शब्दों और कविताओं का प्रयोग करके विपक्ष के नेताओं को भी अपना कायल बना देते थे| उन्होंने अपने जीवन में कई कविताएं लिखीं| आइए, जानते हैं अटलजी की लिखी पांच प्रमुख कविताएं|

1. पंद्रह अगस्त की पुकार

पंद्रह अगस्त का दिन कहता, आज़ादी अभी अधूरी है।

सपने सच होने बाकी है, रावी की शपथ न पूरी है।।

जिनकी लाशों पर पग धर कर, आज़ादी भारत में आई।

वे अब तक हैं खानाबदोश, ग़म की काली बदली छाई।।

कलकत्ते के फुटपाथों पर, जो आँधी-पानी सहते हैं।

उनसे पूछो, पंद्रह अगस्त के बारे में क्या कहते हैं।।

हिंदू के नाते उनका दु:ख सुनते यदि तुम्हें लाज आती।

तो सीमा के उस पार चलो, सभ्यता जहाँ कुचली जाती।।

इंसान जहाँ बेचा जाता, ईमान ख़रीदा जाता है।

इस्लाम सिसकियाँ भरता है, डॉलर मन में मुस्काता है।।

भूखों को गोली नंगों को हथियार पहनाए जाते हैं।

सूखे कंठों से जेहादी नारे लगवाए जाते हैं।।

लाहौर, कराची, ढाका पर मातम की है काली छाया।

पख्तूनों पर, गिलगित पर है, ग़मगीन गुलामी का साया।।

बस इसीलिए तो कहता हूँ आज़ादी अभी अधूरी है।

कैसे उल्लास मनाऊँ मैं? थोड़े दिन की मजबूरी है।।

दिन दूर नहीं खंडित भारत को पुन: अखंड बनाएँगे।

गिलगित से गारो पर्वत तक आज़ादी पर्व मनाएँगे।।

उस स्वर्ण दिवस के लिए आज से कमर कसें बलिदान करें।

जो पाया उसमें खो न जाएँ, जो खोया उसका ध्यान करें।

2. कदम मिलाकर चलना होगा।

बाधाएं आती हैं आएं, घिरें प्रलय की घोर घटाएं,
पांवों के नीचे अंगारे, सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं,
निज हाथों में हंसते-हंसते, आग लगाकर जलना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।

हास्य-रूदन में, तूफानों में, अगर असंख्यक बलिदानों में,
उद्यानों में, वीरानों में, अपमानों में, सम्मानों में,
उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
पीड़ाओं में पलना होगा। कदम मिलाकर चलना होगा।

उजियारे में, अंधकार में, कल कहार में, बीच धार में,

घोर घृणा में, पूत प्यार में, क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,

जीवन के शत-शत आकर्षक, अरमानों को ढलना होगा.

कदम मिलाकर चलना होगा

सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ, प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,

सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ, असफल, सफल समान मनोरथ,

सब कुछ देकर कुछ न मांगते, पावस बनकर ढलना होगा.

कदम मिलाकर चलना होगा

कुछ कांटों से सज्जित जीवन, प्रखर प्यार से वंचित यौवन,

नीरवता से मुखरित मधुबन, परहित अर्पित अपना तन-मन,

जीवन को शत-शत आहुति में, जलना होगा, गलना होगा.

क़दम मिलाकर चलना होगा.

 

3. भेद में अभेद खो गया

भेद में अभेद खो गया| बंट गये शहीद, गीत कट गए,

कलेजे में कटार दड़ गई| दूध में दरार पड़ गई.

खेतों में बारूदी गंध, टूट गये नानक के छंद

सतलुज सहम उठी, व्यथित सी बितस्ता है|

वसंत से बहार झड़ गई, दूध में दरार पड़ गई|

अपनी ही छाया से बैर, गले लगने लगे हैं ग़ैर,

ख़ुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता|

बात बनाएं, बिगड़ गई, दूध में दरार पड़ गई|

क्षमा करो बापू! तुम हमको, बचन भंग के हम अपराधी,

राजघाट को किया अपावन, मंज़िल भूले, यात्रा आधी।

जयप्रकाश जी! रखो भरोसा, टूटे सपनों को जोड़ेंगे।

चिताभस्म की चिंगारी से, अन्धकार के गढ़ तोड़ेंगे।

 

4. कौरव कौन, कौन पांडव

कौरव कौन, कौन पांडव,

टेढ़ा सवाल है| दोनों ओर शकुनि

का फैला कूटजाल है|

धर्मराज ने छोड़ी नहीं, जुए की लत है|

हर पंचायत में पांचाली अपमानित है|

बिना कृष्ण के आज महाभारत होना है,

कोई राजा बने, रंक को तो रोना है|

5.हरी हरी दूब पर

हरी हरी दूब पर ओस की बूंदे

अभी थी, अभी नहीं हैं|

ऐसी खुशियाँ, जो हमेशा हमारा साथ दें

कभी नहीं थी, कहीं नहीं हैं|

क्काँयर की कोख से फूटा बाल सूर्य,

जब पूरब की गोद में पांव फैलाने लगा,

तो मेरी बगीची का पत्ता-पत्ता जगमगाने लगा,

मैं उगते सूर्य को नमस्कार करूँ या उसके ताप से भाप बनी,

ओस की बुँदों को ढूंढूँ? सूर्य एक सत्य है

जिसे झुठलाया नहीं जा सकता

मगर ओस भी तो एक सच्चाई है

यह बात अलग है कि ओस क्षणिक है

क्यों न मैं क्षण क्षण को जिऊँ?

कण-कण मेँ बिखरे सौन्दर्य को पिऊँ?

सूर्य तो फिर भी उगेगा,

धूप तो फिर भी खिलेगी,

लेकिन मेरी बगीची की

हरी-हरी दूब पर,

ओस की बूंद

हर मौसम में नहीं मिलेगी।

– अटल बिहारी वाजपेयी

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