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बहुआयामी रचनाकार Kamleshwar की व्यंग्यात्मक कहानी

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बहुआयामी रचनाकार कमलेश्वर  का पूरा नाम ‘कमलेश्वर प्रसाद सक्सेना’ (Kamleshwar Prasad Saxsena Story) था| उनका जन्म उत्तरप्रदेश के मैनपुरी में 6 जनवरी, 1932 को हुआ था। प्रारम्भिक पढ़ाई के पश्चात कमलेश्वर ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की परीक्षा उत्तीर्ण की। वे बीसवीं सदी के सबसे सशक्त लेखकों में से एक हैं। कहानी, उपन्यास, पत्रकारिता, स्तंभ लेखन, फ़िल्म पटकथा जैसी अनेक विधाओं में उन्होंने अपनी लेखन प्रतिभा का परिचय दिया। आप भी पढ़ें उनकी कहानी |

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“लाश”

मोर्चे की गतिविधियां तेज़ी पकड़ती जा रही थीं. मोर्चे की विशालता का अंदाज़ लगाकर पुलिस कमिश्नर ने पीएसी बुला लिया था. जगह-जगह सशस्त्र पुलिस तैनात कर दी थी. अपने चौकस इंतज़ाम की ख़बर देने के लिए जब पुलिस कमिश्नर मुख्यमंत्री के पास पहुंचा तो देखा मुख्यमंत्री के चेहरे पर कोई चिंता या परेशानी नहीं थी. गृहमंत्री धीरे-धीरे मुस्करा रहे थे. पुलिस कमिश्नर ने तफ़सील देनी शुरू की, पर मुख्यमंत्री विशेष उत्सुकता से नहीं सुन रहे थे. गृहमंत्री भी बहुत दिलचस्पी नहीं ले रहे थे. कमिश्नर कुछ हैरान हुआ. उसने एक क्षण रुककर उन दोनों की तरफ़ ताका, तो मुख्यमंत्री ने अपना चश्मा साफ़ करते हुए कहा,‘‘ख़्वामख़्वाह आपने इतनी तवालत की.’’

‘‘इन विरोधी पार्टियों का कुछ भरोसा नहीं…’’ कमिश्नर कह रहा था. ‘‘मोर्चा शांत रहेगा,’’ गृहमंत्री ने कहा. कमिश्नर बोला,‘‘मुझे तो…’’ मुख्यमंत्री ने बात काट दी,‘‘बहुत ऊधम नहीं मचेगा. बस ज़रा गुंडों पर नज़र रखिएगा…’’
‘‘ठीक है. तो मैं इजाज़त लूं?’’ कमिश्नर ने पूछा.
‘‘ठीक है,’’ मुख्यमंत्री ने कहा,‘‘मेरे ख़्याल से आप मोर्चे के कर्ताधर्ताओं से मिलते हुए निकल जाइए. तीनों यहीं एमएलए हॉस्टल में टिके हुए हैं…’’

Hindi Kahani : शब्दों में बहुत ताकत होती है

कमिश्नर ने ज़रा सकुचाते हुए कहा,‘‘जी मुझे मालूम है, पर वहां जाकर मिलना… मेरे ख़्याल से ठीक नहीं होगा…’’
‘‘अरे भई, आपको मालूम नहीं, उनमें से कांति तो मेरे साथ जेल में रहे हैं. बड़े आदर्शवादी आदमी हैं… तेज़ और बेलाग. ऐसे विरोधी को तो मैं सर-माथे बिठाता हूं.’’ मुख्यमंत्री ने तारीफ़ करते हुए आगे कहा,‘‘अब मोर्चे का मामला है, इसलिए शायद वे मिलने न आएं, नहीं तो हमेशा आते हैं…’’
‘‘इस पार्टीबाज़ी और पॉलिटिक्स को क्या कहा जाए… कांतिलाल जी को तो सरकार में होना चाहिए था…’’ गृहमंत्री ने बड़े दुख से कहा.
‘‘बिलकुल…’’ मुख्यमंत्री बोले. उन्होंने फिर कहा,‘‘देखते जाइए, मिल जाएं तो ठीक है… मेरा नमस्कार बोलिएगा.’’ कमिश्नर नया था. सकुचाते हुए बोला,‘‘मोर्चेवाले शायद आपका पुतला भी जलाएंगे…’’

‘‘अरे ठीक है, जलाने दीजिए… इससे आपका क़ानून कहां भंग होता है. जो उनके दिल में आए करने दीजिए, आप बस निगरानी रखिए.’’
चार बजे चौक मैदान से जुलूस चल पड़ा. मोर्चा ज़बरदस्त था. सबसे आगे झंडे और बिगुल थे. उनके पीछे अभियान गीत गाने वालों की टोली थी. उसके पीछे मांगों की तख़्तियां पकड़े औरतों की टोली थी. उसके पीछे हज़ारों की संख्या में प्रदर्शनकारी थे. सब लोग टोपियां लगाए थे. हाथों में छोटे-छोटे झंडे या मांगों की तख़्ती पकड़े थे.

मोर्चा बहुत शान से चल रहा था. बीचों बीच झंडों से सजी जीप पर कांतिलाल, साथी नेता और महत्वपूर्ण लोग थे. सचमुच विश्वास नहीं होता था कि इतनी तादाद में लोग अब भी इन तरीक़ों पर भरोसा करते होंगे. शानदार और उमड़ता हुआ अपार जुलूस अदम्य शक्ति से बढ़ता जा रहा था. फ़ोटोग्राफ़र इमारतों पर चढ़-चढ़कर हर मोड़ पर जुलूस के चित्र खींच रहे थे. विदेशी फ़ोटोग्राफ़र ज़्यादातर आदिवासियों वाली टोली के चित्र उतार रहे थे.

एक मुस्कान का महत्व

लम्बी सड़क पर जाते हुए जुलूस का दृश्य अदृश्य था. मीलों तक अजगर की तरह. लाखों पैर-ही-पैर… लाखों सिर-ही-सिर. तभी एकाएक विध्वंस हो गया… जुलूस के अगले हिस्से में भगदड़ मच गई. सारा बाराबांट हो गया. चारों तरफ़ बदहवासी भर गई. इमारतों की खिड़कियों और दुकानों के दरवाज़े तड़-तड़ होने लगे. जुलूस दौड़ती-भागती चीखती-चिल्लाती बदहवास और अंधी भीड़ में बदल गया. चारों ओर भयंकर बदअमनी फैल गई. तोड़फोड़ की गूंजती हुई आवाज़ें और घबराहट भरी चीखें आईं और गोलियां चलने की चटखती हुई तड़तड़ाहट से वातावरण व्याप्त हो गया. धुएं के समुद्र में जैसे लाखों लोग ऊब-चूब रहे हों. हुंकारे, चीखें, धमाके, शोर और तड़तड़ाहट. देखते-देखते सड़कों पर सिर्फ़ जूते-चप्पलें, झंडे और मांगों की तख़्तियां रह गईं. फटे कपड़े, टोपियां, टूटे डंडे और फटी हुई पताकाएं.

कुछ पता नहीं चला कि यह विध्वंस कैसे हुआ. क्यों हुआ? पुलिस की गाड़ियों में दंगाई और घायल भरे गए. घायलों को अस्पताल में पहुंचा दिया गया. दंगाइयों को दस मील ले जाकर छोड़ दिया गया. चोटें बहुतों को आई थीं. वे आपस में कुचल गए थे. पुलिस ने गोली चलाई ज़रूर थी, पर हवाई फ़ायर किए थे. सारा शहर सन्न रह गया था. ग़नीमत थी कि इतने बड़े हादसे में सिर्फ़ एक लाश गिरी थी. वह लाश भी बिल्कुल सालिम थी. उसके न गोली लगी थी, न वह कहीं से घायल थी.

पुलिस ने लाश के चारों ओर से डेरा डाल लिया था. पुलिस का कहना था कि लाश कांतिलाल की है. कांतिलाल ने यह सुना तो हैरान रह गए. भगदड़ और उस भयंकर हादसे से प्रकृतिस्थ होकर कुछ देर बाद वे लाश को देखने पहुंचे. उसे देखते ही कांतिलाल ने जोश से भरे स्वर में कहा,‘‘यह मुख्यमंत्री की लाश है.’’ हादसे का मुआयना करने के लिए मुख्यमंत्री भी निकल चुके थे. उन्होंने यह सुना तो सकपकाए हुए पहुंचे. उन्होंने ग़ौर से लाश को देखा और मुस्कराते हुए बोले,‘‘यह मेरी नहीं है.’’

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