Hindi Kahani : इमाम साहब की इबादत

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एक इमाम साहब जंगल से गुजर रहे थे चलते-चलते उन्हें एक लोमड़ी दिखाई दी जो चल नहीं सकती थी क्योंकि उसके पैर नहीं थे। ध्यान से देखने पर इमाम साहब को पता चलता है कि इसकी तो आंखे भी नहीं है और ये देख भी नहीं सकती पर वो ज़िंदा थी। इमाम साहब के मन में रहम आ गया। वो उसके पास पहुंचे और उसे प्यार से सहलाने लगे लेकिन साथ ही इमाम साहब ये सोच कर भी परेशान हुए जा रहे थे कि जब ये चल नहीं सकती देख नहीं सकती तो ये ज़िंदा कैसे है?

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क्योंकि न तो ये खा सकती है न पी सकती है न ही शिकार कर सकती है। और इस बियाबान जंगल में ऐसा कौन होगा जो इसे खिलाता-पिलाता होगा, क्योंकि यहां कोई इंसान तो रहता नहीं। बस ये सोचते-सोचते वो लोमड़ी के नज़दीक ही बैठ गए सुबह से दोपहर, दोपहर से शाम होने को आई लोमड़ी को खाना तो नसीब ही नहीं हुआ। तो आखिर ये ज़िंदा रहेगी कैसे? अब चूंकि इमाम साहब भी पैदल चलकर आए थे तो पैदल चलने के कारन वो थक भी गए थे तो उनकी आंख लग गई।

सूरज ढल चुका था, शाम हो रही थी और मग़रिब की नमाज़ का वक़्त हो चला था। तो जैसे ही नमाज़ का वक़्त हुआ अचानक लोमड़ी के सिर के पास की ज़मीन फटने लगती है और अल्लाह का एक फरिश्ता हाथों में दूध का कटोरा लेकर हाज़िर होता है और लोमड़ी को दूध पिलाने लगता है। दूध पिलाने के बाद जैसे ही फरिश्ता जाने को होता है कि अचानक इमाम साहब उसे पकड़ लेते हैं और उससे पूछते हैं कि तुम कौन हो और अचानक कहां से आए?

फरिश्ता कहने लगा मुझे अल्लाह ने भेजा है इस लोमड़ी को सुबह शाम दूध पिलाने के लिए। क्योंकि उस ऊपर वाले ने जन्म दिया है तो पालना भी उसकी जवाबदारी है, वो अपने हर बन्दे के दाना-पानी का ख़याल रखता है। इतना कहकर वह फरिश्ता गायब हो जाता है। अब इमाम साहब अचानक जाग जाते हैं और सोचते हैं कि दाना-पानी देने का काम तो अल्लाह का है। बस ये सोचकर वो वही पर अल्लाह की इबादत करने बैठ जाते हैं।

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अब इबादत करते-करते रात हो जाती है लेकिन न तो कोई फरिश्ता आता है और न ही कोई भोजन। इमाम साहब परेशान ऊपर से भूख अलग। पर उन्होंने सोचा और इबादत करते हैं शायद अब अल्लाह को लगे की मैं भूखा हूँ। और वो फिर से लग जाते हैं इबादत में। अब रात की सुबह हो जाती है लेकिन फरिश्ता तो फिर भी नहीं आता। और न ही भोजन। अब भूख से व्याकुल इमाम साहब का हाल बेहाल पर फिर भी सुबह से शाम तक एक और ट्राई इमाम साहब ने कर ही लिया। पर बात वहीं की वहीं। न फरिश्ता आया और न भोजन। अब तो इमाम साहब के गुस्से का कोई ठिकाना नहीं था उन्होंने बड़बड़ाते हुए अपने से ही कहा अल्लाह सच नहीं बोलते वादा किया सबको खाना देने का और मुझे भूल गए।

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और वो मुँह लटका कर पैर पटकते हुए घर आ गए। घर में बेगम साहिबा उनके लिए पानी लेकर आई अब इमाम साहब बेगम साहिबा को कुछ कहते उसके पहले ही बेगम साहिबा कह पड़ी। कोई बंदा आया था जैसे अल्लाह का फरिश्ता हो। अल्लाह और फ़रिश्ते की बात सुनकर इमाम साहब बौखलाने वाले ही थे कि उनकी बेगम बोली 50 किलो गेहूं और 50 किलो चावल की बोरी दे गया है और कह रहा था की इमाम साहब को बोलना मेरे दो बच्चे हैं अपने मदरसे में उन्हें पढ़ा दीजिएगा। और अगर कुछ चाहिए तो बच्चों से बोल दीजिएगा। ये सुनकर अचानक इमाम साहब अल्लाह का शुक्रिया कर कहने लगे वहां 24 घंटे भूखा रखा और यहां महीने भर का पहुंचा दिया।

तो दोस्तों कहने का मतलब यही है की ईश्वर हो या अल्लाह चाहे आप किसी धर्म या मज़हब को मानने वाले हों वो ऊपर वाला सबकी व्यवस्था करता है पर किसको कब कहां और कैसे देना है ये उसका काम है। तो फिर आपका काम क्या है? आपका काम है उसकी इबादत करना और उसकी बनाई हुई दुनिया में प्रेम से दया का भाव रखते हुए इंसानियत का फ़र्ज़ निभाना और अपने काम को शिद्दत से करना।

Prabhat

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