ख़िर्द के पास ख़बर के सिवा कुछ और नहीं

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ख़िर्द के पास ख़बर के सिवा कुछ और नहीं

तेरा इलाज नज़र के सिवा कुछ और नहीं

 

हर मुक़ाम से आगे मुक़ाम है तेरा

हयात ज़ौक़-ए-सफ़र के सिवा कुछ और नहीं

 

रंगों में गर्दिश-ए-ख़ूँ है अगर तो क्या हासिल

हयात सोज़-ए-जिगर के सिवा कुछ और नहीं

 

उरूस-ए-लाला मुनासिब नहीं है मुझसे हिजाब

कि मैं नसीम-ए-सहर के सिवा कुछ और नहीं

 

जिसे क़ साद समझते हैं ताजरन-ए-फ़िरन्ग

वो शय मता-ए-हुनर के सिवा कुछ और नहीं

 

गिराँबहा है तो हिफ़्ज़-ए-ख़ुदी से है वरना

गौहर में आब-ए-गौहर के सिवा कुछ और नहीं

 

(साभार : इक़बाल द्वारा लिखित रचनाओं में से एक ‘हर मुक़ाम से आगे मुक़ाम है तेरा’)

-Mradul tripathi

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