सकारात्मक स्वभाव से हर बुराई में अच्छाई खोजी जा सकती है

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Motivational Story In Hindi : सकारात्मक स्वभाव से हर बुराई में अच्छाई खोजी जा सकती है।आपका स्वभाव आपकी प्रकृति पर निर्भर करता है आप जैसा सोचते है वैसा बन जाते है और जैसा बन जाते है वैसा करते है। अगर इंसान सकारत्मक है तो उसे कीचड़ में कमल दिख जाता है। लेकिन अगर इंसान की सोच नकारात्मक है तो उसे कीचड़ ही कीचड़ दिखेगा कमल नहीं। स्थितियां दोनों इंसानो के साथ सामान है लेकिन उनकी प्रकृति के कारण उनका निष्कर्ष बिलकुल विपरीत था. यदि आपकी सोच सकारात्मक है तो आप बुरे से बुरे व्यक्ति के अंदर भी अच्छी ढूढ़ लेंगे। क्योंकि हीरा चाहे कीचड़ में पड़ा हो या सम्राट के ताज में जड़ा हो वह हर हाल में हीरा ही रहता है. इसलिए अपनी सकारत्मक सोच के जरिये दूसरों के मन को दुखी करने वाली बातों को टाला जा सकता है और हर बुराई में अच्छाई खोजी जा सकती है। चली इस से जुडी हुई एक गुरु शिष्य की कहानी मै आपको सुनाता हूँ।

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Motivational Story In Hindi : एक शिष्य अपने गुरु से सप्ताह भर की छुट्टी लेकर अपने गांव जा रहा था। तब गांव पैदल ही जाना पड़ता था। जाते समय रास्ते में उसे एक कुआं दिखाई दिया। शिष्य प्यासा था, इसलिए उसने कुएं से पानी निकाला और अपना गला तर किया। शिष्य को अद्भुत तृप्ति मिली, क्योंकि कुएं का जल बेहद मीठा और ठंडा था। शिष्य ने सोचा – क्यों ना यहां का जल गुरुजी के लिए भी ले चलूं। उसने अपनी मशक भरी और वापस आश्रम की ओर चल पड़ा। वह आश्रम पहुंचा और गुरुजी को सारी बात बताई। गुरुजी ने शिष्य से मशक लेकर जल पिया और संतुष्टि महसूस की। उन्होंने शिष्य से कहा- वाकई जल तो गंगाजल के समान है। शिष्य को खुशी हुई। गुरुजी से इस तरह की प्रशंसा सुनकर शिष्य आज्ञा लेकर अपने गांव चला गया।

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Motivational Story In Hindi : कुछ ही देर में आश्रम में रहने वाला एक दूसरा शिष्य गुरुजी के पास पहुंचा और उसने भी वह जल पीने की इच्छा जताई। गुरुजी ने मशक शिष्य को दी। शिष्य ने जैसे ही घूंट भरा, उसने पानी बाहर कुल्ला कर दिया। शिष्य बोला- गुरुजी इस पानी में तो कड़वापन है और न ही यह जल शीतल है। आपने बेकार ही उस शिष्य की इतनी प्रशंसा की। गुरुजी बोले- बेटा, मिठास और शीतलता इस जल में नहीं है तो क्या हुआ। इसे लाने वाले के मन में तो है। जब उस शिष्य ने जल पिया होगा तो उसके मन में मेरे लिए प्रेम उमड़ा। यही बात महत्वपूर्ण है। मुझे भी इस मशक का जल तुम्हारी तरह ठीक नहीं लगा। पर मैं यह कहकर उसका मन दुखी करना नहीं चाहता था। हो सकता है जब जल मशक में भरा गया, तब वह शीतल हो और मशक के साफ न होने पर यहां तक आते-आते यह जल वैसा नहीं रहा, पर इससे लाने वाले के मन का प्रेम तो कम नहीं होता है ना।

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-Mradul tripathi

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