चार मोटी-मोटी रोटियाँ और भुने हुए आलू के कतरे पोटली में बाँध

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चार मोटी-मोटी रोटियाँ और भुने हुए आलू के कतरे पोटली में बाँध, चूल्हे के पास रख बतकी झोंपड़ी के दरवाजे के पास आ खड़ी हुई। बाहर घटाटोप अन्धकार छाया था। कुछ भी सुझाई न देता था। बस एक्का-दुक्का बड़ी बूँदों के टप-टप पडऩे की आवाज भर सुनाई देती थी। तनिक और आगे बढ़, एक पैर चौखट पर रख, सिर दरवाजे के बाहर कर, चौकन्नी आँखों से उसने इधर-उधर देखने का प्रयत्न किया। उस समय उसके कान भी बूँदों के टप-टप के सिवा और किसी आवाज को, अगर कोई और आवाज हो तो, सुनने के लिए पूरे सतर्क थे। उसे जब कुछ भी सुनाई या दिखाई न दिया, तो सहसा ही व्यस्त-सी हो अन्दर को मुड़ी। कोने में पड़े खाली बोरे को उठा, सकी-‘घोघी’ बना सिर पर रख लिया, और पोटली उठा, बगल में दबा, दीये को फूँक मार झोंपड़ी के बाहर हो गयी। बाहर खड़ी हो एक बार फिर उसने बड़ी सतर्कता से इधर-उधर भाँपा, फिर अत्यधिक शीघ्रता से कुण्डी चढ़ा, चोरों की तरह बेआवाज कदम रखती, वह गली को पार करने लगी। उस वक्त भी दोनों ओर से बोरे के किनारों से ढँकी उसकी चौकन्नी आँखों की पुतलियाँ जुगनुओं-सी कभी-कभी चमक उठती थीं। गली पार कर लेने पर उसकी चाल तेज हो गयी, और थोड़ी ही देर बाद वह उस गहरे अन्धकार में, तेजी से आगे बढ़ता हुआ एक काला धब्बा बनकर रह गयी।

बतकी धीरेन की पुरानी नौकरानी थी, इतनी पुरानी कि उसे घर या गाँव के नवयुवक-समाज में उसके विषय में कुछ भी जानने की किसी को भी तनिक भी उत्सुकता नहीं रह गयी थी, कि बतकी कौन है, वह कहाँ की रहने वाली है, कब, कैसे और क्यों वह धीरेन के घर में आ पड़ी। जैसे उसके कुटुम्ब की तरह वह भी सब की जानी-पहचानी है, उसके जीवन में कोई विशेष रहस्य नहीं, कोई जानने-लायक बात नहीं।

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धीरेन ने जब होश सँभाला, तो उसे बताया गया कि लडक़पन में गर्मी शुरू होते ही उसके शरीर का चप्पा-चप्पा फोड़ों से भर जाता था। फोड़े इतने बदबूदार, मवाददार और इतनी कसरत में होते थे, कि कोई भी उसके पास फटकने की हिम्मत नहीं करता था, छूने की तो बात ही दूर रही। उस वक्त यही बतकी उसे नहलाती-धुलाती, दवा लगाती, और जब वह मारे पीड़ा के चीखता-चिल्लाता, तो वह उसके फोड़ों पर घण्टों फूँक मार उसे आराम पहुँचाती, पुचकारती और दुलारती। उस हालत में भी जब वह उसकी गोद में जाने को मचलता, तो दूसरों के लाख मना करने पर भी, वह उसे फूल की तरह उठाकर बाहर से घुमा लाती, उसका मन बहला लाती। धीरेन अब अपने सुन्दर शरीर को देखता, तो सहसा इन बातों की कल्पना भी उसके दिमाग में नहीं जमती। फिर भी वह बतकी के प्रति अपने को अन्दर-ही-अन्दर कृतज्ञ समझता था। और बतकी का तो पूछना ही क्या? वह धीरेन का सुन्दर, स्वस्थ शरीर देख वैसे ही फूल उठती थी, जैसे कोई डाक्टर अपने रोगी को स्वस्थ देखकर। किन्तु डाक्टर और रोगी की तरह बतकी और धीरेन का सम्बन्ध सामयिक नहीं था। वह सम्बन्ध समय के साथ-साथ और भी गाढ़ा होता गया। यहाँ तक कि पास-पढ़ोस के लोग धीरेन के प्रति बतकी की माया-ममता देख कह उठते—‘‘बतकी पहले जन्म में धीरेन की माँ थी। इस जन्म में भी धीरेन की ममता ही उसे न जाने कहाँ से उसके पास खींच लायी है।’’ बतकी जब यह सुनती, तो सहसा उसका हृदय बोल उठता—‘सच ही तो! अगर अब वह जाना भी चाहे, तो धीरेन को छोड़ते उससे कैसे बनेगा? नहीं, नहीं, धीरेन के बिना अब वह एक पल भी नहीं रह सकती!’

धीरेन भी उसका आदर अपनी माँ से कम न करता। गाँव की पढ़ाई खत्म कर जब वह शहर के हाई स्कूल में पढऩे जाने लगा, तो विदा होते समय उसने अपनी माँ के पैर छूए। बतकी एक ओर खड़ी, भरी-भरी आँखों से उसे देख रही थी। माँ से विदा हो, जब वह बतकी के पास जा उसके चरण छूने को झुका, तो बतकी की आँखों में कब की अटकी बूँदें टप-टप धीरेन के सिर पर चू पड़ीं। उसने झुककर उसे बीच ही में से उठा लिया और गद्गद् हो, उसे छाती से लगा हाथ की पोटली उसके हाथ में थमा दी। धीरेन ने हकबकाकर पोटली को उँगलियों से छुआ, तो गोल-गोल रुपये-से लगे। वह सहसा बोल पड़ा—‘‘फुआ, यह क्या?’’ (कुटुम्ब में धीरेन के पिता और माता को छोड़ सब लडक़े, लड़कियाँ और बहुएँ बतकी को फुआ ही कहकर पुकारती थीं।)

‘‘कुछ नहीं बेटा!’’ तनिक झेंपती-सी बतकी बोली—‘‘तेरी माँ की तरह मेरे पास खजाना तो है नहीं। यह मेरी सालों की कमाई है। तुम्हारे ही घर से मिला है। बेटा, इसे भी अपने ही पर खर्च कर देना।’’

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धीरेन से उस समय कुछ कहते न बन पड़ा। वह उसे वापस न कर सका। वह एक क्षण तक उस बतकी को देखता भर रह गया। पास खड़ी माँ और दूसरे लोगों की नजरें भी उस समय बतकी पर जैसे फूलों की वर्षा कर रही थीं।

हाई स्कूल तक तो कोई गुल न खिला, पर लोगों का कहना है कि कालेज की हवा लगते ही धीरेन का दिमाग बिगड़ गया। अब वह पढऩे-लिखने में दिल नहीं लगाता। आज कहीं पकेटिंग में शामिल हो रहा है, तो कल किसी सभा के संगठन में और परसों कोई जुलूस निकालने का चक्कर। पिता को जब ये बातें मालूम हुई, तो उन्होंने लिखा, ‘बेटा, यही पढऩे-लिखने का जमाना है। कुछ पढ़-लिख लोगे, तो जिन्दगी बन जायगी। काम करने के लिए तो पूरी जिन्दगी ही पड़ी है। अभी से अगर तुम गाँधी बाबा के चक्कर में पड़ गये, तो समझ लो, गये।’ परन्तु धिरेन उस समय तक इतना आगे बढ़ गया था, विद्यार्थी-समाज में इतना लोकप्रिय हो चुका था कि अब कदम पीछे हटाना उसके लिए मुमकिन न था। शुरू जवानी की धुन ही कुछ ऐसी होती है कि जिस ओर दिल-दिमाग की रुझान हो गयी, लडक़ा उसी ओर अन्धे की तरह बढ़ता है। उसके विचारों में इतनी परिपक्वता कहाँ होती है, कि हर कदम वह फूँक कर रखे, और हर काम सोच-समझ करे। चुनांचे धीरेन अपनी राह पर बढ़ता ही गया। पिता ने जब देखा कि उनकी बात का मूल्य पुत्र के लिए कुछ रह ही नहीं गया, तो वह भी चुप हो गये। सोच लिया, लडक़ा बिगड़ गया।

व्यक्तिगत सत्याग्रह का आन्दोलन छिड़ा, तो धीरेन का नाम अग्रणी सत्याग्रहियों में था। पिता तथा घर के लोगों ने जब सुना कि सत्याग्रह करने के अपराध में धीरेन पकड़ लिया गया, तो सब ने सिर पीट लिया। बतकी के जो रोने का तार बँधा, तो तीन दिन तक बिना कुछ खाये-पिये वह पड़ी रही। सब उसे समझाकर हार गये, फिर भी उसने कुछ भी नहीं छुआ। आखिर पिता धीरेन के मुकदमे की पैरवी में जब शहर जाने लगे, तो वह भी उसके साथ हो ली।

हवालात में धीरेन को खड़ा देख, बतकी का कलेजा मुँह को आ गया। वह बरसती आँखों से धीरेन को देखती भर रह गयी।

पिता से जब मालूम हुआ कि उसके पकड़े जाने की खबर पाने के बाद से अब तक बतकी ने एक दाना भी मुँह में नही डाला है, तो धीरेन का हृदय सहसा ही कसक उठा। उसने अपने सामने खड़ी करूणा की मूर्ति, बतकी को, जिसका रोआँ-रोआँ रो रहा था, जिसके जीवन की जैसे सारी खुशियाँ ही हर गयी थीं, देखा। उसकी आँखें भी नम हो गयीं। उसे और भी अपने पास बुला स्नेहाद्र्र्र स्वर में उसने समझाया-बुझाया। पर ऐसा करने से बतकी की व्यथा जैसे सहस्रमुखी हो उठी। उसकी समझ में क्या आना था जो आता? उसे तो अपने धीरेन के सुख-दुख से मतलब था।

फिर पिता जी से केले की फलियाँ मँगायी और अपने ही हाथ से धीरेन ने जब बतकी के मुँह में डाल दिया, तो उससे न खाते न बन पड़ा। उस वक्त मशीन की तरह उसका मुँह चल रहा था, और आँखें पहले से भी अधिक बरस रही थीं। धीरेन उसे ऐसे देख रहा था, जैसे हृदय की सारी ममता, सारा प्यार वह आँखों-द्वारा उस पर उड़ेल रहा हो।

पैरवी का नतीजा न कुछ होना था, न हुआ। दो साल सख्त कैद की सजा सुना दी गयी।

उस वक्त बतकी को कुछ भी बताना मुनासिब न समझ, पिता उससे झूठ-सच कुछ कहकर, उसे बहलाकर घर ले आये। पर बहुत दिनों तक उसे भुलावें में न रखा जा सका। जिस दिन उसे धीरेन की सजा की खबर मालूम हुई, उसी दिन से उसकी जिन्दगी ही बदल गयी। अब पहले-सा घर के काम-काज में उसे न उत्साह ही रह गया और न किसी बात में दिलचस्पी ही। दिन भर बैठी वह या तो आँसू बहाया करती या अपने धीरेन की तस्वीर ले बिसूरती रहती। घर के लोगों ने उसे किसी प्रकार छेडऩा मुनासिब न समझ चुप ही रहना ठीक समझा।

महीने-महीने जब धीरेन से मिलने उसकी माँ, पिता, भाई या दूसरे लोग जेल जाते, तो वह भी उनके साथ जरूर जाती। उस दिन और दिनों से वह कुछ खुश नजर आती, और ऐसी व्यस्त रहती, जैसे कि क्या-कुछ न ले जाय वह अपने धीरेन के लिए।

जेल की अवधि पूरी करने की आवश्यकता न पड़ी। एक साल बाद राजनैतिक वातावरण के बदलते ही धीरने भी दूसरे सत्याग्रहियों के साथ छूटकर घर आ गया। उस दिन घर में दीवाली की खुशी छा गयी। बतकी के हर्ष की तो सीमा ही नहीं थी। उसने कई बार धीरेन के बालों और चेहरे पर स्नेह-भरे हाथ फेरे। अपने ही हाथों उसे न जाने क्या-क्या खिलाया।

कालेज में पुन: प्रवेश न पा सका, तो पिता ने धीरेन को घर पर ही रोक लिया। उसने सिर तो बहुत मारा कि कहीं जाकर राष्ट्रीय कार्यों में सक्रिय भाग ले, पर पिता, माता और बतकी के आगे उसकी एक न चली। अब वह घर ही पर रहने लगा। घर का कुछ काम-काज भी करता और जितना मुमकिन था, कांग्रेस मण्डल को भी अपना सहयोग देता। एकाएक उसका बिगड़ा दिमाग ठीक ही कैसे हो सकता था?

यों ही बिना किसी उतार-चढ़ाव के दिन कट रहे थे, कि अचानक कार्य-समिति ने महात्मा गाँधी के तत्वावधान में जन आन्दोलन छेडऩे का प्रस्ताव पास कर दिया। देश की नस-नस में जैसे नया खून जोरों से दौडऩे लगा। लोगों की उत्सुक आँखें बम्बई पर टिकी थीं। कार्य-समिति उन प्रस्तावों को कार्यान्वित करने के लिए मसविदे तैयार करने में जुटी थी, कि सहसा बिजली की तेजी से यह खबर देश के कोने-कोने में फैल गयी कि सब नेता गिरफ्तार कर लिये गये। छाती के घायल जख्मों पर जैसे किसी ने ठोकर मार दी, काले जुल्मों से घबराई जनता बौखला उठी। सारा राष्ट्र अपमानित हो तिलमिला उठा। सरकार के प्रति बदले की भावना जहर बनकर देश के जर्रे-जर्रे में भीन गयी। विद्रोह की घटाएँ आकाश पर छा गयीं। चारों ओर शोलों की वर्षा शुरू हो गयीं। दिशाएँ दहकते शोलों से लाल हो उठीं।

धीरेन को तो जैसे अपने हौसले पूरा करने का एक नायाब अवसर ही मिल गया। सब रोकते ही रह गये। पर जहाँ हजारों बिगड़े हुए दिमाग वाले जवानों के इंकलाबी नारों से आसमान फट रहा था, जमीन लरज रही थी, वहाँ चन्द सही दिमाग वाले बूढ़े-बूढ़ियों की बातों की हस्ती ही क्या थी? धीरेन के पिता ने उसकी ठुड्डी को हाथ से पकड़ खुशामद-भरे स्वर में कहा—‘‘बेटा, ये नारे नहीं, मौत की पुकारें हैं! तुम इसमें मत शामिल होओ! तुम्हारे बिना भी जो करना होगा,ये कर लेंगे!’’

‘‘और अगर हर नौजवान’’, धीरेन ने निहायत संजीदगी से जवाब दिया—‘‘अपनी जगह पर यही समझ ले, तो फिर गुलाम मुल्क आजाद हो चुका!’’

‘‘नहीं, नहीं, बेटा, तुम मुझे क्यों नहीं समझते? चन्द मिनट के लिए तुम एक बाप बनकर मुझे समझने की कोशिश करो! तुम जरूर समझ जाओगे, मेरे बेटे!’’

‘‘पिता जी, मैं आपको उस हालत में बेहतर समझता,अगर आप भी मेरे साथ…’’

‘‘ओफ! ओ धीरेन की माँ! ओ बतकी! तुम लोग समझाओं इस पागल को! इसका दिमाग बिगड़ गया है। यह अपने साथ ही सारे खानदान को मिट्टी में मिलाने पर तुला है।’’ कहकर उन्होंने अपना माथा ठोंक लिया। देखते-ही-देखते माँ, बतकी और भाभियों ने धीरेन को चारों ओर से घेर लिया और तरह-तरह से खुशामदें कर उसे रोकने लगीं। नारे की हर आवाज सुन धीरेन उस व्यूह से अपने को छुड़ाने का जोर मारता, और वे उसे इस तरह जकड़ लेतीं, जैसे अपने में समो लेना चाहती हों। धीरेन की तड़प सीमा पर पहुँच गयी। उसकी आँखें लाल हो उठीं, चेहरा अत्यन्त भयंकर हो उठा, सारा शरीर जैसे फूल-सा गया । उसने एक बार दाँतों को जोरों से भींचा। मालूम हुआ कि … कि उसके पिता सहसा निढाल-से हो बोल उठे—‘‘जाने दो कम्बख्त को!’’ जैसे यह बात खुद ही उनकी समझ में आ गयी, कि जब नौजवानों के दिमाग बिगड़ जाते हैं, तो उन्हें कोई नहीं रोक सकता।

धीरेन छलाँग मार दल में जा शामिल हुआ। सामने ही से गगन-भेदी नारे लगाते लपटों के उन पुतलों का जत्था शोला-सा भडक़ता निकल गया!

‘इसी तरह एक बार सन् सत्तावन में भी कौंम का दिमाग बिगड़ा था’, सामने शून्य में आँखें टिकाये पिता आप ही बड़बड़ा उठे—‘उस समय उसकी दवा गोरों और देश के गद्दारों की गोलियों ने की थी! अबकी फिर राष्ट्र का दिमाग बिगड़ा है। देखें, इस बार … ’ और वह एक पागल की तरह अट्टहास कर उठे।

गाँव के नौजवानों के साथ धीरेन पूरे नौ दिन तक घर न लौटा। घर में बूढ़े और बूढ़ियाँ आँखों में खौफ का सन्नाटा और दिल व दिमाग में भयंकर आशंकाओं को लिये दिन-रात उनकी प्रतीक्षा में घरों की चौखट पर बैठी रहीं। आज खबर आयी कि फलाँ-फलाँ थाने जला दिये गये, पुलिस बन्दूकें फेंक-फेंककर ऐसे भागी, जैसे उनके हाथों में बन्दूकें नहीं, किसी ने बिच्छू पकड़ा दिये हो। कल समाचार आया कि फलाँ-फँला बीज-गोदम लूट लिये गये। ऐसे ही स्टेशनों के जलाने, पटरियों के उखाडऩे, कलक्टरियों के फूँकने, जेल के दरवाजे तोडऩे, खजानों के लूटने की खबरें एक-एक करके आती गयीं। आखिर एक दिन यह भी समाचार आ ही गया कि कलक्टर पकड़ लिया गया। उसने बाकायदे जिले का चार्ज जिला-कांग्रेस के सभापति को दे दिया। अब जिला आजाद है! अगरेजी हुकूमत का शव शोलों में जला दिया गया!

दसवें दिन धीरेन का दल विजयोल्लास में देश-प्रेम भरे गाने गाता, आजादी के नशे में झूमता हुआ गाँव में वापस आ गया। बूढ़े-बूढ़ियों को उनकी आजादी की घोषणा से जितनी खुशी नहीं हुई, उतनी अपने लालों के सही-सलामत वापस आ जाने पर हुई, जैसे आजादी की बात उनके लिए कोई कीमत न रखती हो! खुद बूढ़े, अक्ल बूढ़ी, दुनिया देखी नहीं! आजादी की कीमत क्या समझें? नौजवानों ने कहकहा लगाया!

लेकिन अभी दो दिन भी आजादी की नींद न सो पाये थे, कि एक रात सहसा गोलियों की धाँय-धाँय की कडक़ती आवाजों से रात का सन्नाटा चीत्कार कर उठा। अँधेरे आकाश में सनसनाती गोलियाँ हजारों धूमकेतुओं की तरह टूट-टूटकर चक्कर लगाने लगीं। जिधर कान लगाओ, धाँय, जिधर आँख उठाओ, लपटों की लकीर! ‘हाय-हाय! अब क्या होने को है?’ बूढ़े-बूढ़ियाँ छाती पीट-पीटकर चीखने-चिल्लाने लगीं। नौजवानों की समझ में कुछ आ ही नहीं रहा था। ओह, अचानक यह क्या हो गया?

इतने में पास के गाँव से भागते हुए एक युवक ने आकर कहा कि गोरे पहुँच गये! भागो! भागो! सारे गाँव में भागो-भागो का शोर बरपा हो गया, जैसे एक जोर का भूकम्प आ गया हो। कल के आजाद नौजवानों को काठ मार गया। उनके दिल की आग ऐसे ठण्डी हो गयी, जैसे उसमें कभी गर्मी थी ही नहीं। भगदड़ ऐसी मच गयी कि किसी को अपनी सुध-बुध भी नहीं रही। बच्चों की बिलबिलाहट, औरतों की चीख, बूढे-बूढ़ियों का रोना-पीटना, कुत्तों का भौंकना और सब के ऊपर भागते हुए पैरों की आवाजें!

‘‘पिता जी!’’ धीरेन ने सिर झुकाकर कहा—‘‘मैं जा रहा हूँ! मेरा आप लोगों के साथ रहना ठीक नहीं! मेरा नाम विद्रोहियों के सरगनों में है। मेरी वजह आप लोगों पर भी आफत…’’

‘‘ओह!’’ बीच ही में पिता बोल उठे—‘‘आज तो तुम बड़ी सुलझी हुई बातें कह रहे हो, बेटा! मैंने तो समझा था कि तुम्हारा दिमाग बिगड़ गया है, उसका इलाज…’’

‘‘पिता जी, यों समय बर्बाद न कीजिए! मेरा दिमाग ठीक है। गोरों की गोलियों का मुकाबला करने के लिए हमारे पास कुछ नहीं है!’’

‘‘क्यों बेटे, और कुछ नहीं, तो उनका मुकाबला करने के लिए तुम्हारे पास सीना तो है! बिगड़े दिमाग वाले गोलियों का मुकाबला सीनों से ही सदा करते आये हैं। मैं तो समझता था कि तुम्हारा ही क्या सारे राष्ट्र का दिमाग बिगड़ गया है! तुम लोगों की बीमारी का पहला दौरा भी मुझे सत्तावन से कुछ अधिक जोरदार मालूम पड़ा। सोचता था, शायद अबकी इस बीमारी की दवा हमेशा-हमेशा के लिए हो जाय! मगर मैं गलती पर था। बेटा, सच पूछो, तो यह हिस्ट्रिया का एक मामूली दौरा था दुनिया के आधुनिक इतिहास में दिमाग बिगडऩे की बीमारी दो ही राष्ट्रों को मुकम्मल तौर पर हुई। पहला फ्रांस था और दूसरा रूस। उनसे पूछो, वह बताएँगे कि इस बीमारी की दवा सिर्फ गोलियाँ है! यह बीमारी सिर्फ गोलियों से जाती है! यह अमृत की गोलियाँ जिसने खा लीं, वह अच्छा हो गया! इनमें जीवन का जौहर है! इनसे मुर्दा राष्ट्र को जीवन मिलता है! इनमें वह गुण है कि जिसने खाली, हमेशा, हमेशा के लिए जिन्दा हो गया। काश, हिन्दुस्तान का दिमाग सचमुच बिगड़ता! काश वह गोलियों की कीमत आँक पाता!’’ कहकर उन्होंने एक ठण्डी साँस ली। फिर अपनी आँखें शून्य में टिका दीं। फिर एकाएक काँप-से उठ, जैसे उनकी आँखों के सामने आकाश में खून के छीटे तैर रहे थे, जमीन पर खून की धारों में लथपथ लाशें तड़प रही थी, कितने ही गोलियों के निशाने, फाँसी के तख्ते …‘‘उफ!’’ कहकर उन्होंने अपना मुँह हाथों से ढँक लिया।

‘‘पिता जी, इस वक्त आप ऐसी बातें न कीजिए! मुझे आज्ञा दीजिए, और अपने बचाव का इन्तजाम कीजिए!’’ अपने में बेहद उलझा हुआ धीरेन बोला।

‘‘जाओ! कहकर पिता ने मुँह फेर लिया।

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धीरेन चौखट लाँघ ही रहा था कि बतकी सामने खड़ी हो, उसे विह्वल आँखों से देखती उतावली-सी पूछ बैठी—‘‘कहाँ चले?’’

धीरेन ने अपना मुँह उसके कान के पास ले जा कुछ फुस-फुसाया, फिर उसकी पीठ थपथपा कुछ सान्त्वना दे वह भाग खड़ा हुआ।

देखते-ही-देखते गाँव उजड़ गया। दहशत से लरजते, खौफ के सन्नाटे में लिपटे गाँव की गलियाँ गोरों के बूटों से रौंदी जाने लगीं। लगातार अपने दोनों ओर बिना कुछ देखे-सुने वे गोलियों की बौछार करते दौड़ लगा रहे थे। न उनकी गोलियाँ दम लेने का नाम लेतीं, न उनके पैर रूकने का। उनके पीछे-पीछे चन्द जयचन्द और मीरजाफर के वंशज कुत्तों की तरह पूँछ हिलाते भाग रहे थे और बीच-बीच में बताते जा रहे थे—‘‘यह फलाने का घर है। यह सरगना था।’’ गोरे रुक जाते। गुस्से और नफरत से उनका लाल चेहरा वीभत्सता की सीमा तक लाल हो उठता। उस घर की दीवारें पहले चाँदमारी का निशाना बनतीं, फिर पेट्रोल छिडक़कर गोलियों से आग लगा दी जाती। घर हू-हू कर जल उठता।

थोड़ी ही देर में गाँव का आसमान धुएँ और लपटों से भर गया। कल का आजाद गाँव आज प्रलय का तमाशा बन रहा था। कल जिसका कोना-कोना इंकलाबी नारों से गूँज रहा था, आज वही गोलियो की धाँय-धाँय से लरज-लरजकर चीख रहा था—‘ए इंकलाबी नौजवानों! कहाँ हैं तुम्हारे आसमान फाडऩे वाले वे नारे’? कहाँ है तुम्हारी जलती हुई आँखों की वे लपटें? कहाँ हैं तुम्हारे दिलों की वे तूफानी धडक़नें? कहाँ हैं तुम्हारे खून की उबाल से फटते हुए वे अंग? कहाँ हैं तुम्हारी चोटों की कसकन, जिसने विद्रोह के लिए तुम्हें उभारा था?’’

हु-हु कर जलते हुए घरों के धुएँ में लिपटी हुई लपटों ने जैसे अट्टहास किया—‘कौन, कहता है कि वे इंकलाबी थे? कौन कहता है कि वे इंकलाब का कीमत जानते थे?’ और फिर एक जोर का अट्टहास हुआ—‘इंकलाब बड़ा कीमती है! इंकलाबी इसे हर कीमत पर खरीदता है! बूढें,जवान, बच्चे सब को जब तक इंकलाब से इश्क नहीं हो जाता, सब जब तक सच्चे मानी में इंकलाबी नहीं हो जाते, तब तक एक ये गाँव इसी तरह जलते रहते हैं, यह गोलियाँ इसी तरह धाँय-धाँय करती रहती हैं।

दमन-चक्र का पहला दौर यों ही आग, खून, आँसू के दरिया से गुजरकर समाप्त हुआ। अब सरकार को उन सरगनों के सिरों की जरूरत थी। गाँव-गाँव में हथियारबन्द पुलिस पूरे अधिकारों के साथ बैठा दी गयी। जयचन्दों और मीरजाफरों ने ले खुले हाथों उन्हें मदद देने के लिए हाथ बढ़ाया।

धीरेन कहाँ है, इसका पता केवल बतकी को था वह मसलहतन धीरेन के कुटुम्ब के साथ न रह अलग एक झोपड़ी में रहने लगी थी। उसका काम रात को लुक-छिपकर धीरेन को खाना पहुँचाना, उसे कुटुम्ब का समाचार देना और उसका समाचार लाना था। यह बला का खतरनाक काम था। फिर भी बतकी उसे करती थी।

उस रात भी बतकी सदा की तरह सतर्क खेतों से गुजरती हुई धीरेन के यहाँ जा रही थी। सहसा गन्ने के खेत में पत्तों की खडख़ड़ाहट हुई। वह ठिठककर एक बार चौकन्नी नजरों से इधर-उधर देखने लगीं। इतने में खेत की गीली मिट्टी में बूटों के भद-भद पडऩे की आवाज आयी, और फिर चार-पाँच अँधेरे परदे पर आगे बढ़ती हुई छाया-मूर्तियाँ उभर पड़ीं। बतकी के प्राण नाखून में समा गये। अब क्या करे? वह लपककर बगल के गन्ने के खेत में गठरी-सी बन साँस रोककर बैठ गयी। दिल जोरों से धडक़ रहा था। आँखों में खौफ थर्रा रहा था।

सहसा एक प्रकाश का गोला उसके शरीर पर पड़ा। वह बेहद घबराकर उठी कि गन्ने के तनों में उलझकर गिर पड़ी। थोड़ी ही देर बाद उसने अत्यधिक सहमी हुई आँखों से देखा, सामने हाथों में बन्दूक और हण्टर लिये, साक्षात यमराज की तरह भयंकर रूप धारण किये पुलिस के आदमी खड़े हैं। अब?

एक बार फिर उसके मुँह पर प्रकाश का गोला पड़ा। आगे बढक़र एक मीरजाफर ने कहा—‘‘यह बतकी है। धीरेन की पुरानी नौकरानी। इसे जरूर मालूम होगा धीरेन का पता!’’

‘‘अच्छा, घसीटकर इसे बाहर ले आओ!’’ दारोगा ने दाँत पीसते हुए गुस्से में हुक्म दिया।

वह घसीटकर पगडण्डी पर लायी गयी। सिर से पैर तक खौफ की पुतली बनी बतकी के शरीर में कहीं प्राण था, तो उसकी गढ़ों में धँसी हुई छोटी-छोटी-आँखों में। वह एक अजीब तरह से उन्हें देख रही थी। शरीर के और अंग जैसे काठ हो गये थे।

बन्दूक के कुन्दे से उसके कन्धे पर एक ठोकर दे एक ने पूछा—‘‘बता, कहाँ है धीरेन?’’

ठोकर खा उसकी बाँह उठी कि बगल की पोटली जमीन पर आ रही। उसने लपकर उसे उठाना चाहा कि पोटली पर एक ने बूट रखकर कहा—‘‘क्या रखा है इसमें?’’ फिर उठाकर देखा, तो रोटियाँ और भूने हुए आलू के कतरे!

‘‘अच्छा!’’ खिलखिलाकर कह पड़ा वह—‘‘तो धीरेन के लिए खाना ले जा रही थी!’’ कहकर उसने रोटियाँ हवा में उछाली, और गेंद की तरह उनके नीचे आते ही बूट से यों मारा कि वे टुकड़े-टुकड़े हो इधर-उधर बिखर गये।

‘‘पापी!’’ चीख-सी पड़ी बतकी कि सड़-सड़ हण्टर बरस पड़े उसकी पीठ पर। आह-आह कर बिखर गयी वह। खून के फव्वारे छर्र-छर्र बरस पड़े।

‘‘बता धीरेन का पता! नहीं तो!’’ फिर सड़-सड़ की आवाज हवा में कौंधी, कुन्दों की ठोकरें बूढ़ी हड्डियों पर खटखट बज उठी। बूटों की ठोकरों से हड्डियों की जोड़े चट-चट कर टूट गयीं।

‘आह!’ एक लम्बी-सी आह चीख के साथ जोर से उठी पर जैसे बीच ही में घुट-सी गयी। कहीं यह शरीर की पीड़ा उसे धीरेन का पता बताने को विवश न कर दे। एक बार वह तिलमिलायी। खून-भरी आँखों से उसने उन यमदूतों को देखा। दाँत कटकटाये। फिर जबड़ों को मींच लिया। नहीं, नहीं, वह अपने धीरेन का पता नहीं बात सकेगी! इस अधम शरीर की पीड़ा के कारण वह अपने प्यारे धीरेन के प्राणों को … नहीं नहीं …!

‘‘बताती है या नहीं?’’ हण्टर का वही सड़-सड़। माँस के छोटे-छोटे जिन्दा लोथड़े हवा में हण्टर उठने के साथ-साथ उससे अलग हो तड़प उठे! और खून के छींटे फुहार -से बरस पड़े!

‘आह! आह!’ कराहती हुई अत्यधिक पीड़ा में लिपटा हुई चन्द आहें! उसका खून से सराबोर मुँह खुला—‘‘पा …

‘‘पानी की बच्ची!’’ बूट की ठोकर खा उसका मुँह दूसरी ओर मुड़ गया। गालों का माँस बूट की ठोकर से चिफत गया। उभरी हुई हड्डियाँ नंगी हुई, फिर खून की धारों से ढँक गयीं।

‘‘बोल! बता! नहीं तो! यह ले, यह ले!’’ फिर वही सब कुछ।

‘अब? अब?’ उसकी आत्मा अन्दर-ही-अन्दर चीख उठी। ‘अब नहीं सहा जाता। यह जीभ तड़प रही है। अब, अब नहीं, नहीं! वह इस जीभ को धीरेन के दुश्मन को …’ उसने जगह-जगह छिली और बिथुरी हुई मुठ्ठियों को बाँधा। जीभ को दाँतों से दबा जबड़ों को भींच लिया और पत्थर का बुत बन पड़ गयी।

हण्टर बरसे! ठोकरें लगीं! कुन्दें गिरे! पर अब न वह आह, न तड़प!

‘‘हैं, मर तो नहीं गयी?’’ दारोगा ने टार्च जलाया बतकी का वीभत्स शरीर खून में लथपथ था। तडफ़ड़ाते-तडफ़ड़ाते जैसे अब थककर वह शान्त पड़ गया। साँसें धुक-धुक चल रही थीं। टूटा-फूटा खून उगलता सिर एक ओर को लटक गया था।

‘‘इसे जरा पानी पिलाओ! इसे मरना नहीं चाहिए। नहीं तो हाथ का आया शिकार …’’

एक ने बगल में लटके पानी के बर्तन का काग खोल, झुककर बतकी के मुँह पर धार गिरानी चाही।

दारोगा ने प्रकाश किया कि सिपाही बोल उठा—‘‘सरकार, इसकी जीभ तो कट-कटकर बाहर निकल आयी है।’’

‘‘ओह! तब तो जीते जी भी यह अब हमारे लिए बेकार हो गयी। इसने शायद जान-बूझकर अपनी जबान दाँत से काट ली है कि कहीं पीड़ा के असह्य हो उठने पर धीरेन का पता मुँह से न निकल जाय। दीवान जा, यह बूढ़ी तो बला की हिम्मतवर और चालाक निकली।’’

‘‘चालाक क्या, सरकार!’’ भला दारोगा से भी कोई चालाक हो सकता है, यह सोच दीवान ने कहा—‘‘पागल है! नहीं तो क्या यों जान दे देती!’’

‘‘हाँ, तुम ठीक कहते हो, यह पागल ही थी। और इसका दिमाग भी उस बूढ़े की तरह, जो कल अपने बेटे को पकड़ लिये जाने पर पागल की तरह उसे छुड़ाने को मुझसे उलझ पड़ा था और जो मेरी गोली का शिकार बन गया था, बिगड़ गया होगा! यह बीमारी ही कुछ ऐसी है, दीवान जो, एक बार इसमें फँसा मौत के घाट उतरा। इसका कोई दूसरा इलाज नहीं! लेकिन अब की यह दवा सरकार ने इतनी सस्ती कर दी है कि मुल्कमें अब एक भी बिगड़े दिमाग वाला ढूँढे पर भी नहीं मिलेगा! सब मौत के घाट उतर जायँगे—सब अच्छे हो जायँगे, दीवान जी!’’ कहकर शैतानियत को भी शर्माता अट्टहास कर उसने टार्च का प्रकाश बतकी पर फेंका। बतकी का आखिरी साँसें लेता टूटा-फूटा शरीर एक बार जोर से तड़पा। फिर हाथ-पाँव काँपे। धीरे-धीरे कँपकँपाहट धीमी होती गयी। हाथ और पंजे चिंगुरे, और दूसरे क्षण शरीर अकडक़र लम्बा हो गया।

दारोगा ने बूट की ठोकर से एक इन्सान की लाश को आखिरी सलामी दी। और कहा ‘‘ले जाओ इसे घसीटकर और भोर होने के पहले किसी गढ़ें में दबा दो।’’

बतकी की टाँगें पकड़ पुलिसमैन उसे कुत्ते की तरह घसीटते हुए लिये जा रहा था। उस वक्त पूर्वी क्षितिज के दामन का एक कोना आने वाले सूर्य के खून से लाल हो उठा था।

(साभार: भैरव प्रसाद गुप्त द्वारा लिखित कहानियों में से एक ‘बिगड़े हुए दिमाग ‘)

-Mradul tripathi

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