Hindi Kahani : वास्तविक मुक्ति

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एक संत के शिष्य ने एक बार उहे प्रणाम करते हुए कहा की है गुरुदेव मुझे, मुझे मुक्ति का मार्ग बताएं| मैं मुक्ति पाना चाहता हूं और इस हेतु में आपसे सदमार्ग पाने यहाँ आया हूं | संत ने उसे जवाब दिया | कब्रिस्तान जाओ और सारी कब्रों को गालियां देकर आओ| शिष्य को यह अजीब लगा लेकिन उसने संत के कहे अनुसार ऐसा ही किया| अगले दिन वह शिष्य फिर संत के सामने खड़ा था | संत ने उससे कहा, इस बार तुम फिर कब्रिस्तान जाओ और वहां मौजूद सारी कब्रों के सामने स्तुति करो| शिष्य ने फिर उनकी आज्ञा का पालन करते हुए ऐसा ही किया और शिष्य एक बार फिर संत के सन्मुख प्रणाम करते हुए प्रस्तुत था |

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अब संत से उससे पूछा कि क्या तुम्हारे गाली देने या स्तुति करने पर कब्रिस्तान में कोई प्रतिक्रिया हुई| या किसी प्रकार का कोई समर्थन या विरोध तुमने महसूस किया | शिष्य ने ने ना में जवाब दिया | फिर संत बोले यह दुनिया ऐसी ही मरणशील है| यहां मान-अपमान के बारे में नहीं सोचना ही मुक्ति का मार्ग है| मान-अपमान, अपना-पराया जैसे सांसारिक व्यवधानों में पद कर हम पता नहीं किस ओर भागने में लगे है ओर फिर ईश्वर ओर मुक्ति की बातें करते है|

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जबकि सांसारिक चीजों से परे होना और ईश्वर में सच्ची आस्था ही मुक्ति है | संत की बात सुनकर शिष्य को समझ में आया की मुर्दा किसी भी बात पर प्रतिक्रिया न देते हुए शांति से कब्र में सोया रहता है वहीं जीवित व्यक्ति हार बात पर प्रतिक्रिया देने को आतुर रहता है और विचलित भी रहता है|

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