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Hindi Kahani : सत्य की हमेशा जीत

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हमारे धर्म ग्रन्ध, पौराणिक कथाएं, महापुरुषों के सुवाक्य और उनका जीवन चरित्र हमें हमेशा से ही सत्य की राह पर चलने की प्रेरणा देते आये है| ऐसा ही एक प्रसंग है देशबन्धु चित्तरंजनदास (Chittaranjan Das Story) से जुड़ा हुआ | देशबन्धु चित्तरंजनदास (Deshbandhu Chitrangadas) जब छोटे थे, तब उनके चाचा ने उनसे पूछा-‘तुम बड़े होकर क्या बनना चाहते हो।’‘मैं चाहे जो बनूं, किन्तु वकीन नहीं बनूंगा’-चित्तरंजन ने उत्तर दिया।

चाचा फिर बोले-‘ऐसा क्यों, भला।’ ‘वकालत करने वालों को कदम-कदम पर झूठ बोलना पड़ता है। बेईमानों का साथ देना पड़ता है।’-चित्तरंजन ने कहा। परन्तु भाग्य की विडम्बना देखिये कि चित्तरंजन दास बड़े होकर वकील हो गये। किन्तु उनकी वकालत दूसरों से भिन्न थी। वे झूठे मुकदमे कभी नहीं लेते थे।

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वे पारिश्रमिक भी जितनी मेहनत करते उतनी ही लेते। उनकी योग्यता का लाभ दीन-हीन, असहाय एवं देशभक्त ही उठाते। कभी-कभी वे गरीबों की पैरवी वे निःशुक्ल की कर दिया करते थे।जो भी मुकदमा लेते, उसमें पूरी रुचि दिखाते तथा सम्बन्धित व्यक्ति को जिताने का हरसंभव प्रयास करते।

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इस प्रकार चित्तरंजनदास ने यह सिद्ध कर दिया कि वकालत जैसा व्यवसाय भी सत्य, न्याय तथा ईमानदारी के साथ सम्पन्न किया जा सकता है। कहानी का सार यह भी है सत्य की हमेशा जीत होती है | हालात और परिस्थितिवश सत्य परेशान हो सकता है लेकिन परास्त नहीं होता |

सत्य की हमेशा जीत हर हाल में होती है| कई बार हम नेकी की राह पर चलने का संकल्प लेते है सत्य की राह चुनते है लेकिन इस राह में आने वाली परेशानियों के चलते इससे कठिन मान इरादा बदल देते है |

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किन्तु साहस के साथ इस पर डटे रहने वाले ही अंतिम सफलता पाते है| सत्य पर चलने से जीवन में मिलने वाली सफलता और सुख का आनंद ही कुछ और होता है| माना की राह कठिन है लेकिन सत्य सर्वोपरि है और अंत में विजय भी सत्य की ही होती है|

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