अलग ही होता है देने का आनंद

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आज रविवार होने से प्रो.सुवीर अपने गार्डन में पौधों को पानी दे रहे थे तभी आवाज़ सुनाई दी -अंकल पॉलिश करवाना है क्या ?
प्रो.सुवीर ने देखा कि गेट पर 10-12 साल का एक बच्चा कंधे पर बैग और हाथ में पॉलिश का ब्रश लिए खड़ा है ।
पढ़ाई-लिखाई करते हो या नहीं ? प्रो.सुवीर ने गेट खोलते हुए पूछा ।

उसने कहा-करता हूं ना अंकल|मदद करने के दृष्टिकोण से उन्होंने अपने दो जोड़ी जूते पॉलिश करने के लिए दे दिए ।
नाम क्या है तुम्हारा ?
अंकल….सोहन
तुम यह काम क्यों करते हो ?
अंकल मेरे पापा का दो साल पहले एक्सीडेंट हो गया था, वे भी यही काम करते थे इसलिए मैं भी यह काम करता हूं । मेरी पढ़ाई और कपड़े के खर्चे निकल आते हैं ।
और तुम्हारी मां ?
वे कारखाने में मजदूरी करती है ।
इस बीच उसका पॉलिश का काम पूरा हो गया था ।
पैसे देने के बाद प्रो.सुवीर ने कहा – यहीं रुको..| वे घर के अंदर से कुछ कॉपियां और पेन लेकर आए और उसे देने लगे ।
अंकल आपने पॉलिश के पैसे तो दे दिए …थोड़ा हिचकिचाते हुए सोहन बोला ।
अरे.. रख लो पढ़ाई में काम आएंगी । मुझे अच्छा लगेगा, जो तुम यह रख लोगे । तुम नहीं जानते देने का सुख क्या होता है ।
सोहन ने बैग में कॉपियां एवं पेन रख लिए ।
अगले रविवार सोहन फिर उसी क्षेत्र में उनके घर के गेट पर था। संयोगवश प्रो.सुवीर घर के दालान में ही थे ।
सोहन ने पॉलिश का पूछा तो प्रो.सुवीर ने कहा – पहले यह बताओ कॉपियां और पेन काम में लिए या नहीं ?
अंकल, कॉपियां तो मैंने काम में ले ली, उत्साहित हो सोहन बोला पर पेन……पेन मैंने मेरे दोस्त को दे दिए ।
पेन तुम्हें पढ़ाई के लिए दिए थे और तुमने दोस्त को दे दिए ….इससे अच्छा था कि मैं तुम्हें कॉपियां-पेन देता ही नहीं । प्रो.सुवीर क्रोधित हो झल्लाते हुए सोहन से बोले ।
अंकल….अंकल..सोहन डरते-डरते बोला – वो मेरा दोस्त भी गरीब है …वो अनाथ है और मेरे साथ ही पढ़ता है….उसे जरूरत थी तो मैंने…..अंकल आपने कहा था कि देने का सुख तू नहीं जानता तो यह जानने के लिए भी मैंने.. दे दिए ।
जवाब सुन प्रो.सुवीर का गुस्सा काफ़ूर हो चुका था| द्रवित हो ग्लानि भरे मन से उन्होंने सोहन के सिर पर आशीष भरा हाथ रखा और बोले – बेटा सच्चा सुख तो तुमने पा ही लिया और मैंने सुख का विस्तार ।

-डॉ. सुधीर महाजन देवास 

 

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