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Hindi Short Story : नया बस्ता

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सुनो, मुन्नू का आज पहला दिन था स्कूल में। गया तो खुशी-खुशी था पर आया जब से चुपचाप सा है, कुछ बात नही कर रहा। मीना ने सुरेश की थाली में रोटी रखते हुए कहा। सुरेश ने पानी वाली दाल या दाल का पानी कटोरी में उड़ेलते हुए पूछा – तूने पूछा नही उससे कि क्यों उदास है? पहली बार स्कूल गया आज तो उदास होगा रोज जाएगा, दोस्त बनेंगे तो उसे अच्छा लगेगा।

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नही जी, ये बात नही। वो बस इतना बोला कि बाबा को कहना कि कल से ये थैली वाला बस्ता नही ले जाऊंगा। नया बस्ता ला देना, जैसा सब लाते हैं। ठीक से खाया भी नही और सो गया।

मीना ने कुछ डरते कुछ सहमते हुए कहा। क्या? नया बस्ता? अभी? तू जानती है कि बहुत दिनों से मजदूरी नही मिली, पैसों का बोलो तो मालिक दुत्कारता है। उसको समझा देना कि जैसे ही पैसे मिलेंगे उसका बस्ता ला दूंगा। अभी थैली ही ले जाए। एक ही बच्चा है हमारा, कोई कसर नही छोडूंगा। अच्छा तूने खाना खाया या नही। सुरेश ने बेबसी से खाली पतीली और डब्बे की तरफ देख पूछा। ना, मुझे भूख नही। आज जी अच्छा नही है। तुम खाओ। मीना ने बर्तन समेटते हुए कहा।

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मीना और सुरेश ने पूरी रात मुन्नू की खुशी और नए बस्ते की फिक्र में गुजार दी। कब दोनो की आंख लगी पता नही। अचानक सुबह जब नींद खुली तो हड़बड़ाकर उठी, देखा तो मुन्नू उसकी थैली पर कागज के रंगबिरंगे फूल लगा रहा था, थैली को सजा रहा था। मीना ने आश्चर्य से पूछा मुन्नू ये क्या कर रहा है तू?

मुन्नू चहककर बोला मां देख मैंने अपना नया बस्ता बना लिया। ऐसा बस्ता तो पूरे स्कूल में किसी के पास भी नही। तू बाबा को बोल देना कि उनके मालिक से पैसे नही मांगे। नहीं तो वो फिर डांटेगा। मुझे मेरा नया बस्ता मिल गया। दोनो समझ गए कि मुन्नू ने रात को उनकी सारी बातें सुन ली थी। सुरेश और मीना ने मुन्नू को प्यार से गले लगा लिया। नए बस्ते में लगे फूल भी जैसे संतुष्ट हो मुस्कुरा रहे थे।

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– कहानीकार डॉ दीपा मनीष व्यास, इंदौर

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