नाम में ही सब रखा है

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आपने सुना ही होगा कि नाम में क्या रखा है क्योंकि शांति का स्वभाव क्रांति, दौलतचंद का काम भीख मांगना, लक्ष्मी का लोगों के यहां झाड़ू पोछा करना और गरीबमल का नगर सेठ बन जाना भी हमने देखा है|आजादी के सात दशक बाद अब देश में इसके मायने बदलते नज़र आ रहे हैं | अब तो लगता है कि दिल्ली का नाम सियासतगढ़ और मुंबई का फ़िल्मीपुरम होना ही चाहिए क्योंकि आजकल नाम में ही सब रखा हैं | मज़हबी भेदभाव को नकारने वाले ज्यादातर सियासी खेमे नाम बदलने और न बदलने की जद्दोजहद में नए मुद्दे के साथ इन दिनों काफी मेहनत कर रहे हैं |

Short Story In Hindi : अच्छा कौन ?

वैसे भी मुद्दों पर सिर्फ मेहनत की जानी चाहिए, उन्हें सुलझा लिया गया तो सियासत का क्या होगा | एक ओर जहां जगहों के, सरकारी योजनाओं के, दफ्तरों के, सड़कों के  नाम बदलकर खुद को देशभक्त, विकासवादी और हिंदूवादी साबित किया जा रहा है वहीं दूसरी ओर इसका पुरजोर विरोध कर अपने विपक्षी होने का धर्म निभाया जा रहा है | कुल मिलाकर सियासत बखूबी चल रही है | हिन्दुस्तान में यह संभव है क्योंकि यहां भावनाओं की बड़ी क़द्र है | भावुकता और धर्म के नाम पर आप अपना वर्चस्व कई सालों तक कायम रख सकते हैं | दुनिया की तारीखें गवाह हैं|

प्रेरणादायी अनमोल वचन

यहां देशहित के नाम पर की जाने वाली सियासत को लेकर आज तक कोई अवॉर्ड नहीं बना हैं क्योंकि दुनिया शायद जानती है कि इसका बेताज़ बादशाह एक ही मुल्क हो सकता है | वैसे भारत में सियासत किसी पुरस्कार की मोहताज नहीं | आए दिन अखबारों के पहले पन्नों और ब्रेकिंग न्यूज़ की शोभा बढ़ाते बड़े बयान और उन पर पलटवार के लिए उपयुक्त भाषाशैली का गिरता स्तर अपने आप में किसी बड़े सियासी तमगे से कम नहीं हैं | ज़िक्र नाम बदलने का हो रहा था | नाम बदलने के फायदे के बारे में बात न की जाए तो बेहतर होगा | कहने का मतलब वह सवाल ही क्यों किया जाए, जिसका जवाब ही नहीं ईजाद किया गया है| ख़ामख्वाह बगलें झांकने की जहमत उठानी पड़ेगी| हमारे सफ़ेदपोशों को, लेकिन यह चिंता हमें है उन्हें नहीं, वे तो आत्मविश्वास से लबरेज हैं | उनसे यदि पूछा भी गया तो घुमा-फिराकर ऐसा जवाब दिया जाएगा  कि आप भी दंग रह जाएंगे कि आपने सवाल क्या किया था | जवाब …..जवाब में ही तो सब निहित है|

कविता : ज़ख्म भर जाएंगे तुम मिलो तो सही

आगे के बयान, चुनाव की तैयारी, पार्टी का एजेंडा और सबसे ज्यादा खुद का पॉलिटिकल करियर, देश के सबसे ज्वलंत मुद्दों पर दिए गए जवाबों पर ही निर्भर हैं | दोनों प्रमुख दलों में ऐसे कई आला कमान अधिकारी और सिपहसालार  मिल जाएंगे, जो सिर्फ जवाब देने के दौरान रखी गई सावधानियों के कारण आज कहां से कहां हैं | यही हाल उनका भी हैं, जो इन सावधानियों की सीमा को लांघ गए और एक पॉलिटिकल दुर्घटना का शिकार हो बैठे |  नाम का बदल दिया जाना महज एक सोच नहीं वरन भविष्य की राजनीति के लिए सालों तक चलाए जाने वाले मुद्दों की फ़ेहरिस्त का वह नया मुद्दा हैं, जिस पर पक्ष-विपक्ष अपनी रोटियां सेंकते रहेंगे और देश के मुख्य मुद्दों की ओर पीठ कर सोते रहने के बावजूद खुद को देशभक्त साबित कर खुद का नाम रोशन करते रहेंगे  क्योंकि ”नाम में ही सब रखा हैं |”

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