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आप भी पढ़ें प्रभाकर माचवे की रचनाएं

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प्रभाकर माचवे का जन्म 1917 में ग्वालियर, मध्य प्रदेश में हुआ था। इनकी शिक्षा इंदौर और आगरा में हुई। इन्होंने एम.ए., पी-एच.डी. एवं साहित्य वाचस्पति की उपाधियां प्राप्त कीं।  हिन्दी पर इनकी काफी अच्छी पकड़ है, जो इनकी रचनाओं में परिलक्षित होता है| आप भी पढ़ें इनकी रचनाएं |

Javed Akhtar साहब की बेमिसाल नज्में

दे थोड़ी-सी भेज शरम !

मृदुल नींद नीड़ की गोद में

और परों की सेज नरम,

बाहर झुलसी हवा बह रही

रह-रह कर लू तेज़ गरम,

बाहर अर्धनग्न पीड़ा

भीतर क्रीड़ा-लबरेज़ हरम,

करुणा के आँगन में, नेता

दे थोड़ी-सी भेज शरम !

बादल बरसै मूसलधार…

बादल बरसै मूसलधार
चरवाहा आमों के नीचे खड़ा किसी को रहा पुकार
एक रस जीवन पावस अपरम्पार
मेघों का उस क्षितिजकूल तक पता न पाऊँ
कि कैसा घुल-मिल है संसार
-एक धुन्ध है प्यार…
बहना है
यह सुख कहना क्या
उठना-गिरना लहर-दोल पर
हिय की घुण्डी मुक्त खोल कर
पर उस दूर किसी नीलम-घाटी से यह क्या बारम्बार-
चमक-चमक उठता है ?
बिम्बित आँखों में अभिसार…
आज दूर के सम्मोहन ने यात्रामय कर डाला
बिखर गया वह संचित सुधि-धन जो युग-युग से पाला ।
पर यह निराकार आधार
कहाँ से सीटी बजा रहा है
बुला रहा है, पर बेकार-
यहाँ से छुट्टी रज़ा कहाँ है ?
गैयाँ चरती हैं उस पार
दूर धवीले चिन्ह मात्र हैं
जमना लहरै तज बन्ध-
बादल बरसै मूसलधार

Hindi Kahani : कांच का गिलास

धूमिल मेघों से भरा नभ का पड़ाव…

निशि मेघाकुल…

अमित असित धूमिल मेघों से भरा हुआ नभ का पड़ाव

शशि की झिलमिल-

छोटी-सी लहरों में डगमग पथहीन नाव

किस मृगनैनी की चपल-चपल-

चितवन की सुधि से परिचालित युव-मनोभाव !

शशि न देख किसी का दिल

रह-रह कस के, स्मर कर प्रिय का दुराव-

छिन में आलोकित हो उठती शत-शत तरंग

मन में आलोड़ित सौ उमंग, सिहरते अंग

उड़-उड़ जाते हैं सुधि-विहंग

कुछ दिशा-रहित, कुछ लक्ष्य-भ्रान्त

कुछ सखा-सहित, कुछ यों असंग-

सब ही अशान्त;

ज्योत्स्ना का छिन में कुम्हलाता

लहरिल सम्मोहक मदिर मान

जोगी हो मोहातुर गाता

मन में तुषार-मय विदा-गान;

प्रत्यक्ष भाव जब सपनों की संचित रुझान

जब बाँध रखे वक्ष से वक्ष

बाँहो में भर कर विकल बाँह

जाना था किसने नेह राह का

यह विषाक्त भवितव्य, आह !

बँधना प्राणों से मुक प्राण…
है दक्ष-यज्ञ का संविधान
उर की ऊमा का लक्ष-लक्ष अंशों में पाना मरण-दान !
अब डोंगी भी हिल-डोल उठी, पाकर गंगा का दूर तीर
मनुआ अधीर, नयन के नीर से बोझिल गहरी बिसुध पीर
छितरा-छितरा-सा व्योमघाट पर छायाभा का अजब साथ-
आखिर उर में भी डोल उठी, कुछ मावस, कुछ रुपहली रात !

छू चली पुरातन नेह-बात

रोमल हो उठे गात-गात।

टिम-टिम तारा ऊपर सभीत
खेया का कम्पित कंठ-गीत
आ भर लूँ हिय में तुझे मीत…
आ पास और उत्कटता से…

Hindi Kahani : सच्चाई हमेशा ख़ुशी देती है…

उत्ताल लहर की मर्ज़ी पर

खो दें जीवन पल-कल्प प्रहर;

एकान्त सत्य बहते रहना-

निज बिधा किसी से क्या कहना ?

सुधि-सम्बल ले चिर-एकाकी

बस सफ़र-सफ़र;

आ पास और तन्मयता से-

अब इन लहरों की मर्ज़ी पर,

मिल कर जीवन में जीवन-स्वर,

हो जायें अमर, निर्भर, अन्तर

उत्ताल परंगों की गति पर-

क्या पता कहाँ आना-जाना क्या कूलों की परवाह, पिया !
इस क्षण दो ओठों में गाना दो ओठों में हो चाह, पिया !
वह हिलराता, मदमाता हो, मौजें लेता दरियाव, पिया !
मेघों में मुँह ढाँके मयंक, सुधि मन में गिनती घाव, पिया !

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