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आप भी पढ़ें रामचन्द्र शुक्ल की कविताएं

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रामचन्द्र शुक्ल, 20 वीं शताब्दी के हिन्दी के प्रमुख साहित्यकार हैं | इनके द्वारा लिखी गयी पुस्तक ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ जिसके द्वारा आज भी पाठ्यक्रम निर्माण में सहायता ली जाती है | आप भी पढ़ें उनकी कविता|

गोपालकृष्‍ण भट्ट ‘आकुल’ की पर्यावरण पर आधारित कविताएं

हमारी हिंदी

मन के धन वे भाव हमारे हैं खरे।
जोड़ जोड़ कर जिन्हें पूर्वजों ने भरे ।।
उस भाषा में जो हैं इस स्थान की।
उस हिंदी में जो हैं हिन्दुस्तान की ।।
उसमें जो कुछ रहेगा वही हमारे काम का।
उससे ही होगा हमें गौरव अपने नाम का ।।

‘हम’ को करके व्यक्त, प्रथम संसार से।
हुई जोड़ने हेतु सूत्रा जो प्यार से ।।
जिसे थाम हम हिले मिले दो चार से।
हुए मुक्त हम रोने के कुछ भार से ।।
उसे छोड़कर और के बल उठ सकते हैं नहीं।
पडे रहेंगे, पता भी नहीं लगेगा फिर कहीं ।।

पहले पहल पुकारा था जिसने जहाँ।
जिन नामों से जननि प्रकृति को, वह वहाँ ।।
सदा बोलती उनसे ही, यह रीति हैं।
हमको भी सब भाँति उन्हीं से प्रीति हैं ।।
जिस स्वर में हमने सुना प्रथम प्रकृति की तान को।
वही सदा से प्रिय हमें और हमारे कान को ।।

भोले भाले देश भाइयों से जरा।
भिन्न लगें, यह भाव अभी जिनमें भरा ।।
जकड़ मोह से गए, अकड़ कर जो तने।
बानी बाना बदल बहुत बिगड़े, बने ।।
धरते नाना रूप जो, बोली अद्भुत बोलते।
कभी न कपट-कपाट को कठिन कंठ के खोलते ।।

सोचने पर मजबूर करती कुंवर बेचैन की कविताएं  

अपनों से हो और जिधर वे जा बहे।
सिर ऊँचे निज नहीं, पैर पर पा रहे ।।
इतने पर भी बने चले जाते बड़े।
उनसे जो हैं आस पास उनके पडे ।।
अपने को भी जो भला अपना सकते हैं नहीं।
उनसे आशा कौन सी की जा सकती हैं कहीं? ।।

अपना जब हम भूल भूलते आपको,
हमें भूलता जगत हटाता पाप को ।।
अपनी भाषा से बढ़कर अपना कहाँ?
जीना जिसके बिना न जीना हैं यहाँ ।।
हम भी कोई थे कभी, अब भी कोई हैं कहीं।
यह निज वाणी-बल बिना विदित बात होगी नहीं ।।

देशद्रोही की दुत्कार

रे दुष्ट, पामर, पिशाच, कृतघ्न, नीच।
क्यों तू गिरा उदर से इस भूमि बीच ।।
क्यों देश ने अधम स्वागत हेतु तेरे।
आनन्द उत्सव उपाय रचे घनेरे ।।

सोया जहाँ जननि-आ ( निशंक होके।
माँगा जहाँ मधुर क्षीर अधीर होके ।।
थोड़ी शरीर सुध भी न जहाँ रही हैं।
रे स्वार्थ-अन्ध यह भूमि वही, वही हैं ।।

जो भूमि टेक कर के बल रेंगता था।
हाँ क्या उसे न तुझे से कुछ आसरा था ।।
जो धूल डाल सिर ऊपर मोद माना।
क्यों आज तू बन रहा उससे बिगाना ।।

तू पेट पाल, मन मंगल मानता हैं।
सेवा समस्त सुख की जड़ जानता हैं ।।
खोटी, खरी खटकती न तुझे वहीं की।
पाता जहाँ महक मोदक औ मही की ।।

तेरे समक्ष पर अन्न विहीन दीन।
चिन्ता-विलीन अति क्षीण महा मलीन।।
जो ये अनेक प्रियबन्धु तुझे दिखाते।
लज्जा दया न कुछ भी तुझको सिखाते? ।।

रे स्वार्थ-अन्ध, मतिमंद कुमार्गगामी!
क्यों देश से विमुख हो सजता सलामी?
कर्तव्य शून्य हल्के कर को उठाता।
दुर्भाग्य-भार-हत भाल भले झुकाता ।।

किसके सुअन्न कण ने इस कूर काया।
को पाल पोस पग के बल हैं उठाया? ।।
किसका सुधा सरित शीतल स्वच्छ नीर।
हैं सींचता रुधिर तो चलता शरीर? ।।

किसका प्रसूनरज लेकर मंद वायु।
देती प्रतिक्षण पसार नवीन आयु? ।।
किसका अभंग कल कोकिल कंठ गान।
होता प्रभात प्रति तू सुन सावधान? ।।

स्वातंत्रय की विमल ज्योति जगी जहाँ हैं।
आनन्द की अतुल राशि लगी जहाँ हैं ।।
जा देख! स्वत्व पर लोग जमे जहाँ हैं।
तेरे समान नर क्या करते वहाँ हैं ।।

Ramkumar Verma की मन झकझोरती दो कविताएं

सर्वस्व छोड़ तन के सुख भूल सारे।
जो हैं स्वदेश-हित का व्रत चित्ता धारे ।।
न स्वप्न में कनक हैं जिनको लुभाता।
मानपमान पथ से न जिन्हें डिगाता ।।

तेरे यथार्थ हित हेतु अनेक बार।
जो हैं सदैव करते रहते पुकार ।।
ऐसे सुपूज्य जन से रख द्रोह भाव।
तू नित्य चक्र रच के चलता कुदाव ।।

जा दूर हो अधम सन्मुख से हमारे।
हैं पाप पुंज तुव पूरित अंग सारे ।।
जो देश से न हट तो हृद देश से ही।
देते निकाल हम आज तुझे भले ही ।।

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