वाकई साहित्य के अद्भुत रत्न थे रहीम

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अब्दुल रहीम ‘खानखाना’ का काव्य जगत में महत्वपूर्ण योगदान है | उनका जन्म साल 1553  में बैरम खान के घर हुआ था| हिंदी के प्रसिद्ध कवि रहीम की अकबर के दरबार में एक महत्वपूर्ण जगह थी| वे अकबर के नवरत्नों में से एक थे| कवि होने के साथ वे एक विद्वान सेनापति भी थे| साथ ही उन्हें तुर्की, अरबी,  फ़ारसी, संस्कृत और हिन्दी की भी जानकारी थी| कहा जाता है कि गुजरात के युद्ध में इनके कौशल और पराक्रम को देखकर अकबर ने इन्हें ‘ख़ानखाना’ की उपाधि प्रदान की थी| रहीम के काव्य में नीति, शृंगार और भक्ति भाव मिलते हैं| आप भी पढ़ें उनके दोहे |

रहिमन एक दिन वे रहे, बीच न सोहत हार।
वायु जो ऐसी बह गई, वीचन परे पहार॥183॥

रहिमन ओछे नरन सों, बैर भलो ना प्रीति।
काटे चाटै स्‍वान के, दोऊ भाँति विपरीति॥184॥

रहिमन कठिन चितान ते, चिंता को चित चेत।
चिता दहति निर्जीव को, चिंता जीव समेत॥185॥

रहिमन कबहुँ बड़ेन के, नाहिं गर्व को लेस।
भार धरैं संसार को, तऊ कहावत सेस॥186॥

रहिमन करि सम बल नहीं, मानत प्रभु की धाक।
दाँत दिखावत दीन ह्वै, चलत घिसावत नाक॥187॥

रहिमन कहत सुपेट सों, क्‍यों न भयो तू पीठ।
रहते अनरीते करै, भरे बिगारत दीठ॥188॥

रहिमन कुटिल कुठार ज्‍यों, करत डारत द्वै टूक।
चतुरन के कसकत रहे, समय चूक की हूक॥189॥

रहिमन को कोउ का करै, ज्‍वारी, चोर, लबार।
जो पति-राखनहार हैं, माखन-चाखनहार॥190॥

रहिमन खोजे ऊख में, जहाँ रसन की खानि।
जहाँ गॉंठ तहँ रस नहीं, यही प्रीति में हानि॥191॥

रहिमन जगत बड़ाई की, कूकुर की पहिचानि।
प्रीति करै मुख चाटई, बैर करे तन हानि॥197॥

रहिमन जग जीवन बड़े, काहु न देखे नैन।
जाय दशानन अछत ही, कपि लागे गथ लेन॥198॥

रहिमन जाके बाप को, पानी पिअत न कोय।
ताकी गैल आकाश लौं, क्‍यो न कालिमा होय॥199॥

रहिमन जा डर निसि परै, ता दिन डर सिय कोय।
पल पल करके लागते, देखु कहाँ धौं होय॥200॥

रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गइ सरग पताल।
आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल॥201॥

रहिमन जो तुम कहत थे, संगति ही गुन होय।
बीच उखारी रमसरा, रस काहे ना होय॥202॥

रहिमन ठहरी धूरि की, रही पवन ते पूरि।
गाँठ युक्ति की खुलि गई, अंत धूरि को धूरि॥204॥

रहिमन दुरदिन के परे, बड़ेन किए घटि काज।
पाँच रूप पांडव भए, रथवाहक नल राज॥210॥

रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि।
जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तलवारि॥211॥

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो छिटकाय।
टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय॥212॥

रहिमन धोखे भाव से, मुख से निकसे राम।
पावत पूरन परम गति, कामादिक को धाम॥213॥

रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय।
सुनि अठिलैहैं लोग सब, बाँटि न लैहैं कोय॥214॥

रहिमन निज संपति बिना, कोउ न बिपति सहाय।
बिनु पानी ज्‍यों जलज को, नहिं रवि सकै बचाय।215॥

रहिमन नीचन संग बसि, लगत कलंक न काहि।
दूध कलारी कर गहे, मद समुझै सब ताहि॥216॥

रहिमन नीच प्रसंग ते, नित प्रति लाभ विकार।
नीर चोरावै संपुटी, मारु सहै घरिआर॥217॥

रहिमन पर उपकार के, करत न यारी बीच।
मांस दियो शिवि भूप ने, दीन्‍हों हाड़ दधीच॥218॥

रहिमन पानी राखिये, बिनु पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून॥219॥

रहिमन प्रीति न कीजिए, जस खीरा ने कीन।
ऊपर से तो दिल मिला, भीतर फाँकें तीन॥220॥

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