Ibn-e-Insha की नज्मों का उठाएं लुत्फ़

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इब्ने इंशा (Best Shayari Of Ibne Insha) एक महान शायर थे| इब्ने इंशा उर्दू और हिंदी दोनों में ही बहुत सरल शब्दों में लिखते थे। शायरी, ग़ज़ल, नज़्म, कविता, कहानी, नाटक, डायरी, यात्रा वृत्तांत, हो या संस्मरण साहित्य, ऐसी कोई विधा नहीं है, जिसमें इब्ने इंशा ने लेखन नहीं किया हो| इन सब विधाओं में इब्ने इंशा ने अपने कौशल का लोहा मनवाया है। आइये पढ़ते हैं उनकी कुछ नज़्में|

हिन्दी साहित्य जगत के सशक्त हस्ताक्षर सक्सेनाजी

कल चौदहवीं की रात थी…

कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तेरा।
कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तेरा।

हम भी वहीं मौजूद थे, हम से भी सब पूछा किए,
हम हँस दिए, हम चुप रहे, मंज़ूर था परदा तेरा।

इस शहर में किस से मिलें हम से तो छूटी महिफ़लें,
हर शख़्स तेरा नाम ले, हर शख़्स दीवाना तेरा।

कूचे को तेरे छोड़ कर जोगी ही बन जाएँ मगर,
जंगल तेरे, पर्वत तेरे, बस्ती तेरी, सहरा तेरा।

तू बेवफ़ा तू मेहरबाँ हम और तुझ से बद-गुमाँ,
हम ने तो पूछा था ज़रा ये वक्त क्यूँ ठहरा तेरा।

हम पर ये सख़्ती की नज़र हम हैं फ़क़ीर-ए-रहगुज़र,
रस्ता कभी रोका तेरा दामन कभी थामा तेरा।

दो अश्क जाने किस लिए, पलकों पे आ कर टिक गए,
अल्ताफ़ की बारिश तेरी अक्राम का दरिया तेरा।

हाँ हाँ, तेरी सूरत हँसी, लेकिन तू ऐसा भी नहीं,
इस शख़्स के अश‍आर से, शोहरा हुआ क्या-क्या तेरा।

बेशक, उसी का दोष है, कहता नहीं ख़ामोश है,
तू आप कर ऐसी दवा बीमार हो अच्छा तेरा।

बेदर्द, सुननी हो तो चल, कहता है क्या अच्छी ग़ज़ल,
आशिक़ तेरा, रुसवा तेरा, शायर तेरा, ‘इन्शा’ तेरा।

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हम को ज़ख्म दिखाते हो?

नते हैं फिर छुप-छुप उनके घर में आते जाते हो
इंशा साहब नाहक जी को वहशत में उलझाते हो

दिल की बात छुपानी मुश्किल, लेकिन खूब छुपाते हो
बन में दाना, शहर के अन्दर दीवाने कहलाते हो

बेकल बेकल रहते हो, पर महफ़िल के आदाब के साथ
आँख चुरा कर देख भी लेते हो, भोले भी बन जाते हो

प्रीत में ऐसे लाख जतन हैं, लेकिन एक दिन सब नाकाम
आप जहां में रुसवा होगे, वज़ह हमें फरमाते हो

हम से नाम जुनून का कायम, हम से दश्त की आबादी
हम से दर्द का शिकवा करते, हम को ज़ख्म दिखाते हो?

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इस शहर में दिल को लगाना क्या…

इंशाजी उठो अब कूच करो इस शहर में दिल को लगाना क्या।
वहशी को सुकूं से क्या मतलब जोगी का शहर में ठिकाना क्या॥

इस दिल के दरीदा दामन को देखो तो सही सोचो तो सही।
जिस झोली में सौ छेद हुए उस झोली को फैलाना क्या॥

शब बीती चाँद भी डूब गया ज़ंजीर पड़ी दरवाज़े में।
क्यूँ देर गए घर आए हो सजनी से करोगे बहाना क्या॥

फिर हिज्र की लम्बी रात मियाँ संजोग की तो यही एक घड़ी।
जो दिल में है लब पर आने दो शर्माना क्या घबराना क्या॥

उस रोज़ जो उनको देखा है अब ख़्वाब का आलम लगता है।
उस रोज़ जो उनसे बात हुई वो बात भी थी अफ़साना क्या॥

उस हुस्न के सच्चे मोती को हम देख सकें पर छू न सकें।
जिसे देख सकें पर छू न सकें वो दौलत क्या वो ख़ज़ाना क्या॥

उसको भी जला दुखते हुए मन एक शोला लाल भभूका बन।
यूं आंसू बन बह जाना क्या यूं माटी में मिल जाना क्या॥

जब शहर के लोग न रस्ता दें क्यूं बन में न जा बिसराम करें।
दीवानों की सी न बात करे तो और करे दीवाना क्या॥

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