Vishnu Khare की कविता में लें मालवी का मज़ा

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विष्णु खरे (Best Poems Of Nazeer Akbarabadi) ने नई तरह की भाषा और संवेदना से समकालीन हिंदी कविता को नया मिज़ाज़ दिया बल्कि उसे बदला भी| एक बड़े कवि की पहचान इस बात से भी होती है कि वह पहले से चली आ रही कविता को कितना बदलता है| इस लिहाज़ से खरे अपनी पीढ़ी और समय के एक बड़े उदाहरण हैं|

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हिन्दी मालवी में एक अरज 

नईं साब हम उधर फैजाबाद से नईं अई रिया था
हम तो रतलाम में चढ्या था
ये बई या छोरा म्हारा नईं
पन हम लोग दरवज्जे के नजीक
संडास से सलंग बठी गिया था कईं करां
गर्दी भोत थी टिकट हमारे कने थी
रात मां कईं मालम पड़े हजूर के रिजरब कम्पाट है

हां साब कुछ झन खूप चिल्लई रिया था
डब्बा में से चढ़ी उतरी रिया था
खूप धूम मस्ती थी सरकार
हमसे भी किया जोर से जै बोलो रे
नईं बोलते तो कईं पतो मारता पीटता उतारी देता

नईं साब अपने को नईं मालम पलेटफारम पे कईं हुयो
उतर के देखता तो अपनी या जगा भी चली जाती

फेर गाड़ी धकी तो अचानचक दग्गड़ फत्तर चलने लगा
कंसरे में से किरासन कूड़ने लगे
हमने भोत हाथ पैर जोड़े हुकम
पन हम दबी गये
मालम नईं पड़ा के कुचला के मरे
के अंगार में जल दे हजूर
हमने कभी किसी का कुछ नईं किया
में मजूरो की तलास में अमदाबाद जई रिया था काकासाब
ये बई ओर यो इसका छोरा अपने गाँव

आपके मन में सुना है भोत दया है
म्हारे जैसा बेकसूर मरने वाला के लिए हजूर
इसी कारन अरज करने हाजर हो गये दासाब
हमारी भी कुछ सुनवाई सनाखत हो
कुछ तो इंसाप हो मायबाप
हमारी बात कोई नईं बोलता
हमें तो अबार तक मालम नईं के बात कईं थी
हम तो बसे बोगी के फरस पर जरा सी जगा में बठी गया था मालक
इत्ती बड़ी गाड़ी थी सरकार हमें जाना मो भोत दूर नईं था
चार कलाक में अमदाबाद पोंहची जाता हुकम

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…वे टिमटिमाते तारे

मुझे शायद याद करें वे टिमटिमाते तारे
रातों में जिन्हें देखता था मैं
मुझे न पाकर रोएँगें मेरे पागल विचार
अनजाने ही जिन्हें था लेखता मैं
बरखा मुझे न देखकर कहे
” क्या चल दिया वह ? ”

और आवारा बादलों का टुकड़ा न रहे
पूछ बैठे ” नहीं रहा क्या वह
एक ही, बस एक ही पागल जो
हमें था देखता और मुस्कुराया ? ”

मेरी चिता पर नहीं होंगे किसी के
अश्रु, स्मृति में चढ़ाए फूल
बाद दो दिन के दिखावे के, रोने के,
सभी जाएँगे मुझको भूल
क्या हुआ जो सिरफिरा इक मर गया ?
जगत के आनन्द में कम क्या कर गया ।

आनंद लीजिए Nazeer Akbarabadi के काव्य सौन्दर्य का

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