प्रो.अज़हर हाशमी की चुनिंदा कविताएं

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प्रो.अज़हर हाशमी (Famous Poetry of Azhar Hashmi) जाने माने कवि लेखक, विचारक एवं शिक्षाविद् हैं । आप गरीब अनाथ एवं असहाय बच्चों के मसीहा है । अपने राष्ट्रीय स्तर की व्याख्यान मालाओं में कई समसामयिक विषयों पर व्याख्यान दिए हैं । आपको कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है । आपकी विशिष्ट रचनाएं हैं, रामवाला हिदुस्तान चाहिए, बेटियां पावन दुआएं हैं, मां आदि |

पढ़ें उनकी चुनिंदा कविताएं (Famous Poetry of Azhar Hashmi) :

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मां

मां बच्चों को सदा बचाती,
दुविधा-दिक्कत, कोप-कहर से ।
बुरी नजर ‘छू-मंतर’ होती,
मां की ममता भरी नजर से।।

बच्चों की खुशियों की खातिर,
मां ने मन्नत मान रखी है।
मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारे से,
और साथ में गिरजाघर से ।।

रोजगार के लिए सुबह जब,
शहर चले जाते हैं बच्चे ।
मां तक तक पथ तकती रहती,
जब तक लौटें नहीं शहर से ।।

घर में मां है इसका मतलब,
दया का दरिया है घर में ।
सदा स्नेह के मोती मिलते,
इस दरिया की लहर-लहर से ।।

जिसके साथ दुआ है मां की,
उसको मंजिलमिल जाती है।
चाहे समतल राह से गुजरे,
चाहे गुजरे कठिन डगर से।।

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बेटियां शुभकामनाएं हैं

बेटियां शुभकामनाएं हैं,
बेटियां पावन दुआएं हैं।
बेटियां जीनत हदीसों की,
बेटियां जातक कथाएं हैं।

बेटियां गुरुग्रंथ की वाणी,
बेटियां वैदिक ऋचाएं हैं।
जिनमें खुद भगवान बसता है,
बेटियां वे वन्दनाएं हैं।

त्याग, तप, गुणधर्म, साहस की
बेटियां गौरव कथाएं हैं।
मुस्कुरा के पीर पीती हैं,
बेटी हर्षित व्यथाएं हैं।

लू-लपट को दूर करती हैं,
बेटियाँ जल की घटाएं हैं।
दुर्दिनों के दौर में देखा,
बेटियां संवेदनाएं हैं।

गर्म झोंके बने रहे बेटे,
बेटियां ठंडी हवाएं हैं।

सत्य की जीत

दशहरा का तात्पर्य, सदा सत्य की जीत।
गढ़ टूटेगा झूठ का, करें सत्य से प्रीत॥

सच्चाई की राह पर, लाख बिछे हों शूल।
बिना रुके चलते रहें, शूल बनेंगे फूल॥

क्रोध, कपट, कटुता, कलह, चुगली अत्याचार
दगा, द्वेष, अन्याय, छल, रावण का परिवार॥

राम चिरंतन चेतना, राम सनातन सत्य।
रावण वैर-विकार है, रावण है दुष्कृत्य॥

वर्तमान का दशानन, यानी भ्रष्टाचार।
दशहरा पर करें, हम इसका संहार॥

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वसंत

रिश्तों में हो मिठास तो समझो वसंत है
मन में न हो खटास तो समझो वसंत है।

आँतों में किसी के भी न हो भूख से ऐंठन
रोटी हो सबके पास तो समझो वसंत है।

दहशत से रहीं मौन जो किलकारियाँ उनके
होंठों पे हो सुहास तो समझो वसंत है।

खुशहाली न सीमित रहे कुछ खास घरों तक
जन-जन का हो विकास तो समझो वसंत है।

सब पेड़-पौधे अस्ल में वन का लिबास हैं
छीनों न ये लिबास तो समझो वसंत है।

गायब है गोरैया

चेतन-चिंतन ‘चह-चह’ का लेकर आती थी,
कुदरती घड़ी की ‘घंटी सदृश’ जगाती थी,
खिड़की से, कभी झरोखे से घुसकर घर में,
भैरवी जागरण की जो सुबह सुनाती थी,
गायब है गोरैया, खोजें, फिर घर लाएं ।
रुठी है तो मनुहार करें, हम समझाएं ।

गोरैया की चह-चह में मोहक गीत छिपा,
मीठा-मीठा सा राग छिपा, मनमीत छिपा,
कुदरती गायिका गोरैया की लय में तो,
ऐसा लगता जैसे सूफी-संगीत छिपा,
गोरैया के प्रति प्रेम-समपर्ण दिखलाएं ।
रूठी है तो मनुहार करें, हम समझाएं ।

गोरैया है चिड़िया, किंतु संदेश भी है,
गोरैया उल्लास, उमंग, उन्मेष भी है,
‘तिनका-तिनका गूथों तो घर बन जाएगा’,
गोरैया कोशिश का नीति-निर्देश भी है,
घर आने का उसको न्यौता देकर आएं।
रुठी है तो मनुहार करें हम समझाएं ।

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