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सारे अक्षर पढ़ती जा , आगे-आगे बढ़ती जा

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आज हमारे समाज में कई समस्याएं हैं, जिनके बारे में हम हर जगह पढ़ते और सुनते रहते हैं| आज ‘विजय विश्वकर्मा’ जी की यह कविता उन महिलाओं और लड़कियों को समर्पित है, जिन्हें पढ़ने-लिखने की आज़ादी नहीं दी जाती है। यह कविता उन सभी महिलाओं और बच्चियों को एक उम्मीद और प्रेरणा देती है ताकि वे अपने जीवन में कुछ अच्छा कर सकें। 

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सारे अक्षर पढ़ती जा , आगे-आगे बढ़ती जा।

सारे अक्षर पढ़ती जा , आगे-आगे बढ़ती जा।

शहरों में और गांव में , आज़ादी की छांव में।

शहरों में और गांव में , आज़ादी की छांव में।

नए इरादे गढ़ती जा , आगे-आगे बढ़ती जा।

सारे अक्षर पढ़ती जा , आगे-आगे बढ़ती जा।

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तू साधन कर ले रक्षा के , पंख लगाकर शिक्षा के।

तू साधन कर ले रक्षा के , पंख लगाकर शिक्षा के।

उड़ती जा बस उड़ती जा , आगे-आगे बढ़ती जा।

सारे अक्षर पढ़ती जा , आगे आगे बढ़ती जा।

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तू भारत की पीढ़ी है , और ये विद्या की सीढ़ी है|

तू भारत की पीढ़ी है , और ये विद्या की सीढ़ी है|

इस सीढ़ी पर चढ़ती जा , आगे-आगे बढ़ती जा|

सारे अक्षर पढ़ती जा , आगे-आगे बढ़ती जा।

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इन रुढ़िवादी चालों पर और शोषण के गालों पर।

इन रुढ़िवादी चालों पर, और शोषण के गालों पर।

ख़ूब तमाचे जड़ती जा , आगे-आगे बढ़ती जा।

सारे अक्षर पढ़ती जा , आगे-आगे बढ़ती जा।

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-श्रंखला

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