आधुनिक काल की सर्वश्रेष्ठ शायरी, चुनिन्दा कविताएं पढ़ें

0

‘सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ का जिक्र कीजिए या फिर ‘लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी…’ हर तरफ इकबाल अपने शब्दों से लोगों को बांधते चलते हैं। इनका पूरा नाम अल्लामा इकबाल (Top 5 Muhammad Iqbal Best Poems In Hindi) था| इनका जन्म पंजाब (पाकिस्तान) में 9 नवंबर 1877 को हुआ था। देहांत 21 अप्रैल 1938 में हुआ था। इनकी शायरी में ज्यादातर लोगों को अपने किसी न किसी रूप में अपना अक्स दिखाई देता है। उर्दू और फ़ारसी में इनकी शायरी को आधुनिक काल की सर्वश्रेष्ठ शायरी में गिना जाता है।

जरूर पढ़ें पीयूष मिश्रा की ये कविताएं

Top 5 Muhammad Iqbal Best Poems In Hindi :

1.

सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा

हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिस्ताँ हमारा

ग़ुरबत में हों अगर हम, रहता है दिल वतन में

समझो वहीं हमें भी, दिल हो जहाँ हमारा

परबत वो सबसे ऊँचा, हमसाया आसमाँ का

वो संतरी हमारा, वो पासबाँ हमारा

गोदी में खेलती हैं, जिसकी हज़ारों नदियाँ

गुलशन है जिसके दम से, रश्क-ए-जिनाँ हमारा

ऐ आब-ए-रूद-ए-गंगा! वो दिन है याद तुझको

उतरा तेरे किनारे, जब कारवाँ हमारा

मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना

हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा

यूनान-ओ-मिस्र-ओ- रोमा, सब मिट गए जहाँ से

अब तक मगर है बाकी, नाम-ओ-निशाँ हमारा

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी

सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-जहाँ हमारा

‘इक़बाल’ कोई महरम, अपना नहीं जहाँ में

मालूम क्या किसी को, दर्द-ए-निहाँ हमारा

सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा

हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिसताँ हमारा

लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी
ज़िन्दगी शम्मा की सूरत हो ख़ुदाया मेरी

दूर दुनिया का मेरे दम अँधेरा हो जाये
हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाये

हो मेरे दम से यूँ ही मेरे वतन की ज़ीनत
जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत

ज़िन्दगी हो मेरी परवाने की सूरत या रब
इल्म की शम्मा से हो मुझको मोहब्बत या रब

हो मेरा काम ग़रीबों की हिमायत करना
दर्द-मंदों से, ज़ईफ़ों से, मोहब्बत करना

मेरे अल्लाह बुराई से बचाना मुझको
नेक जो राह हो उस रह पे चलाना मुझको

गुलज़ार, जिनका अंदाज़े बयां सबसे अलग है

2.

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

तही ज़िंदगी से नहीं ये फ़ज़ाएँ

यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं

क़नाअत न कर आलम-ए-रंग-ओ-बू पर

चमन और भी आशियाँ और भी हैं

अगर खो गया इक नशेमन तो क्या ग़म

मक़ामात-ए-आह-ओ-फ़ुग़ाँ और भी हैं

तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा

तिरे सामने आसमाँ और भी हैं

इसी रोज़ ओ शब में उलझ कर न रह जा

कि तेरे ज़मान ओ मकाँ और भी हैं

गए दिन कि तन्हा था मैं अंजुमन में

यहाँ अब मिरे राज़-दाँ और भी हैं

3.

ला फिर इक बार वही बादा ओ जाम ऐ साक़ी

हाथ आ जाए मुझे मेरा मक़ाम ऐ साक़ी

तीन सौ साल से हैं हिन्द के मय-ख़ाने बंद

अब मुनासिब है तिरा फ़ैज़ हो आम ऐ साक़ी

मेरी मीना-ए-ग़ज़ल में थी ज़रा सी बाक़ी

शेख़ कहता है कि है ये भी हराम ऐ साक़ी

शेर मर्दों से हुआ बेश-ए-तहक़ीक़ तही

रह गए सूफ़ी ओ मुल्ला के ग़ुलाम ऐ साक़ी

इश्क़ की तेग़-ए-जिगर-दार उड़ा ली किस ने

इल्म के हाथ में ख़ाली है नियाम ऐ साक़ी

सीना रौशन हो तो है सोज़-ए-सुख़न ऐन-ए-हयात

हो न रौशन तो सुख़न मर्ग-ए-दवाम ऐ साक़ी

तू मिरी रात को महताब से महरूम न रख

तिरे पैमाने में है माह-ए-तमाम ऐ साक़ी

इक परी के साथ मौजों पर…

4.

न आते हमें इस में तकरार क्या थी

मगर वा’दा करते हुए आर क्या थी

तुम्हारे पयामी ने सब राज़ खोला

ख़ता इस में बंदे की सरकार क्या थी

भरी बज़्म में अपने आशिक़ को ताड़ा

तिरी आँख मस्ती में हुश्यार क्या थी

तअम्मुल तो था उन को आने में क़ासिद

मगर ये बता तर्ज़-ए-इंकार क्या थी

खिंचे ख़ुद-बख़ुद जानिब-ए-तूर मूसा

कशिश तेरी ऐ शौक़-ए-दीदार क्या थी

कहीं ज़िक्र रहता है ‘इक़बाल’ तेरा

फ़ुसूँ था कोई तेरी गुफ़्तार क्या थी

5.

जुगनू की रौशनी है काशाना-ए-चमन में

या शम्अ’ जल रही है फूलों की अंजुमन में

आया है आसमाँ से उड़ कर कोई सितारा

या जान पड़ गई है महताब की किरन में

या शब की सल्तनत में दिन का सफ़ीर आया

ग़ुर्बत में आ के चमका गुमनाम था वतन में

तक्मा कोई गिरा है महताब की क़बा का

ज़र्रा है या नुमायाँ सूरज के पैरहन में

हुस्न-ए-क़दीम की इक पोशीदा ये झलक थी

ले आई जिस को क़ुदरत ख़ल्वत से अंजुमन में

छोटे से चाँद में है ज़ुल्मत भी रौशनी भी

निकला कभी गहन से आया कभी गहन में

रहें हर खबर से अपडेट, ‘टैलेंटेड इंडिया’ के साथ| आपको यहां मिलेंगी सभी विषयों की खबरें, सबसे पहले| अपने मोबाइल पर खबरें पाने के लिए आज ही डाउनलोड करें Download Hindi News App और रहें अपडेट| ‘टैलेंटेड इंडिया’ की ख़बरों को फेसबुक पर पाने के लिए पेज लाइक करें – Talented India News

Share.