Ismat Zaidi की ग़ज़लों ने जिंदगी के राग को दिया मर्मस्पर्शी मुकाम

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नई गजलकारों और रचनाकारों में इस्मत ज़ैदी (Best Poems Of Ismat Zaidi) को भी लोग काफी पसंद करते हैं। इनका जन्म 20 जुलाई 1962 को हुआ। इलाहाबाद यूपी में जन्मी ज़ैदी की प्रमुख कृति में ‘साहिल लबे सहरा’ शामिल है। ज़ैदी की गजलों ने जिंदगी के राग को मर्मस्पर्शी मुकाम दिया है। 

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रह न सकी इस चुभन से दूर (read ismat zaidi best ghazals)

ख़ुश्बू-ए-गुल भी आज है अपने चमन से दूर
दरिया में चाँद उतरा है चर्ख़ ए कुहन से दूर

मेरा वजूद ऐसे बियाबाँ में खो गया
ग़ुरबत में जैसे कोई मुसाफ़िर वतन से दूर

थीं शफ़क़तें जहान की अपनों के दरमियाँ
मैं ख़ाली हाथ रह गया आ कर वतन से दूर

माँ की दुआएँ बाप का साया हो गर नसीब
हो ज़िंदगी बलाओं से ,रंज ओ मेहन से दूर

मुझ को ज़रूरियात ने आवाज़ दी बहुत
लेकिन न जा सका कभी गंग ओ जमन से दूर

तू दोस्ती के वास्ते जाँ भी निसार कर
रहना मगर बख़ील से, वादा शिकन से दूर

दरिया के पास आ के भी प्यासा पलट गया
पानी नहीं था क़ब्ज़ ए तश्ना दहन से दूर

कोशिश ये थी शिकस्ता दिलों को सँभाल ले
लेकिन ‘शेफ़ा’ ही रह न सकी इस चुभन से दूर

मेरे मालिक… (read ismat zaidi best ghazals)

मेरे मालिक ख़यालों को मेरे
पाकीज़गी दे दे ,
मेरे जज़्बों को शिद्दत दे ,
मेरी फ़िकरों को वुस’अत दे,
मेरे एह्सास उस के हों ,
मेरे जज़बात उस के हों ,
जियूँ मैं जिस की ख़ातिर ,
बस वफ़ाएँ भी उसी की हों,

मेरे मा’बूद मुझ को,
ऐसी नज़रें तू अता कर दे
कि जब भी आँख ये उठे,
ख़ुलूस ओ प्यार ही छलके,
जिसे अपना कहा मैंने
उसे अपना बना भी लूँ,
मैं उस के सारे ग़म ले कर,
उसे ख़ुशियाँ ही ख़ुशियाँ दूँ,

मेरे अल्लाह मुझ को ,
दौलत ओ ज़र की नहीं ख़्वाहिश,
नहीं अरमान मुझ को
रुत्ब ए आली के पाने का
अता कर ऐसी दौलत
जिस के ज़रिये, मैं
तेरे बंदों के काम आऊँ
मुझे ज़रिया बना कर
उन के अरमानों को पूरा कर
करम ये मुझ पे तू कर दे
मुझे तौफ़ीक़ ऐसी दे
कि तेरी राह पर चल कर
मैं मंज़िल तक पहुँच पाऊँ

प्रेरणा पुरुष Ravindra Jain के चुनिंदा गीत और ग़ज़ल

न डालो बोझ ज़हनों पर… (read ismat zaidi best ghazals)

न डालो बोझ ज़हनों पर कि बचपन टूट जाते हैं
सिरे नाज़ुक हैं बंधन के जो अक्सर छूट जाते हैं

नहीं दहशत गरों का कोई मज़हब या कोई ईमाँ
ये वो शैताँ हैं, जो मासूम ख़ुशियाँ लूट जाते हैं

हमारे हौसलों का रेग ए सहरा पर असर देखो
अगर ठोकर लगा दें हम, तो चश्मे फूट जाते हैं

नहीं दीवार तुम कोई उठाना अपने आँगन में
कि संग ओ ख़िश्त रह जाते हैं, अपने छूट जाते हैं

न रख रिश्तों की बुनियादों में कोई झूट का पत्थर
लहर जब तेज़ आती है, घरौंदे टूट जाते हैं

’शेफ़ा’ आँखें हैं मेरी नम, ये लम्हा बार है मुझ पर
बहुत तकलीफ़ होती है जो मसकन छूट जाते हैं  

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