रबीन्द्रनाथ टैगोर के जन्मदिन पर पढ़ें उनकी कविताएं

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भारत के राष्ट्रगान के लेखक और गुरुदेव के नाम से रबीन्द्रनाथ टैगोर (Rabindranath Tagore Birth Anniversary 2019) ने बांग्ला साहित्य को एक नई दिशा दी। उन्होंने बंगाली साहित्य में नए तरह के पद्य और गद्य के साथ बोलचाल की भाषा का भी प्रयोग किया। इससे बंगाली साहित्य क्लासिकल संस्कृत के प्रभाव से मुक्त हो गया। टैगोर की रचनायें बांग्ला साहित्य में एक नई ऊर्जा ले कर आई।  1913 ईस्वी में गीतांजलि के लिए इन्हें साहित्य का नोबल पुरस्कार मिला जो कि एशिया मे प्रथम विजेता साहित्य मे है।

आज उनके जन्मदिवस के अवसर पर पढ़ें उनकी कविताएं ( Rabindranath Tagore Poems In Hindi) :

छायावाद के संस्थापकों में से एक थे जयशंकर प्रसाद

हो चित्त जहाँ भय-शून्य…

हो चित्त जहाँ भय-शून्य, माथ हो उन्नत
हो ज्ञान जहाँ पर मुक्त, खुला यह जग हो
घर की दीवारें बने न कोई कारा
हो जहाँ सत्य ही स्रोत सभी शब्दों का
हो लगन ठीक से ही सब कुछ करने की
हों नहीं रूढ़ियाँ रचती कोई मरुथल
पाये न सूखने इस विवेक की धारा
हो सदा विचारों ,कर्मों की गतो फलती
बातें हों सारी सोची और विचारी
हे पिता मुक्त वह स्वर्ग रचाओ हममें
बस उसी स्वर्ग में जागे देश हमारा.

मैं कहां से आया मां

निदा फाजली : हिंदी व उर्दू जगत के महान शायर

” बच्चे ने पूछा माँ से , मैं कहाँ से आया माँ ? “

माँ ने कहा, ” तुम मेरे जीवन के हर पल के संगी साथी हो !”

जब मैं स्वयं शिशु थी, खेलती थी गुडिया के संग , तब भी,

और जब शिवजी की पूजा किया करती थी तब भी,

आंसू और मुस्कान के बीच बालक को ,

कसकर, छाती से लिपटाए हुए , माँ ने कहा ,

” जब मैंने देवता पूजे, उस वेदिका पर तुम्ही आसीन थे ,

मेरे प्रेम , इच्छा और आशाओं में भी तुम्ही तो थे !

और नानी माँ और अम्मा की भावनाओं में भी, तुम्ही थे !

ना जाने कितने समय से तुम छिपे रहे !

हमारी कुलदेवी की पवित्र मूर्ति में ,

हमारे पुरखो की पुरानी हवेली मेँ तुम छिपे रहे !

जब मेरा यौवन पूर्ण पुष्प सा खिल उठा था,

तुम उसकी मदहोश करनेवाली मधु गँध थे !

मेरे हर अंग प्रत्यंग में तुम बसे हुए थे

तुम्ही में हरेक देवता बिराजे हुए थे

तुम, सर्वथा नवीन व प्राचीन हो !

उगते रवि की उम्र है तुम्हारी भी,

आनंद के महासिंधु की लहर पे सवार,

ब्रह्माण्ड के चिरंतन स्वप्न से ,

तुम अवतरित होकर आए थे।

अनिमेष द्रष्टि से देखकर भी

एक अद्भुत रहस्य रहे तुम !

जो मेरे होकर भी समस्त के हो,

एक आलिंगन में बध्ध , सम्बन्ध ,

मेरे अपने शिशु , आए इस जग में,

इसी कारण मैं , व्यग्र हो, रो पड़ती हूँ,

जब, तुम मुझ से, दूर हो जाते हो…

कि कहीँ, जो समष्टि का है

उसे खो ना दूँ कहीँ !

कैसे सहेज बाँध रखूँ उसे ?

किस तिलिस्मी धागे से ?

Mahadevi Varma Poems : काव्य जगत की ‘महादेवी’ थीं महादेवी वर्मा

अयि! भुवन मन मोहनी

अयि! भुवन मन मोहनी
निर्मल सूर्य करोज्ज्वल धरणी
जनक-जननी-जननी।। अयि…

अयि! नली सिंधु जल धौत चरण तल
अनिल विकंपित श्यामल अंचल
अंबर चुंबित भाल हिमाचल
अयि! शुभ्र तुषार किरीटिनी।। अयि…

प्रथम प्रभात उदय तव गगने
प्रथम साम रव तव तपोवने
प्रथम प्रचारित तव नव भुवने
कत वेद काव्य काहिनी।। अयि…
चिर कल्याणमयी तुमि मां धन्य
देश-विदेश वितरिछ अन्न
जाह्नवी, यमुना विगलित करुणा
पुन्य पीयूष स्तन्य पायिनी।। अयि…

अयि! भुवन मन मोहिनी।

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