Balkavi Bairagi की मनलुभावन कविताएं

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बालकवि बैरागी (Balkavi Bairagi Best Poems) का जन्म मंदसौर जिले की मनासा तहसील के रामपुर गांव में हुआ। इनकी अधिकांश कविताएं ओजगुण से सम्पन्न हैं। इन्होंने विक्रम विश्वविद्यालय से हिन्दी में एमए किया। ये राजनीति एवं साहित्य दोनों से जुडे रहे। इन्होंने कुछ फिल्मों में भी गीत लिखे हैं |

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तू चंदा मैं चांदनी…(poems of Balkavi Bairagi)

तू चंदा मैं चांदनी, तू तरुवर मैं शाख रे
तू बादल मैं बिजुरी, तू पंछी मैं पात रे

ना सरोवर, ना बावड़ी, ना कोई ठंडी छांव
ना कोयल, ना पपीहरा, ऐसा मेरा गांव रे
कहाँ बुझे तन की तपन, ओ सैयां सिरमोल रे
चंद्र-किरन तो छोड़ कर, जाए कहाँ चकोर
जाग उठी है सांवरे, मेरी कुआंरी प्यास रे
(पिया) अंगारे भी लगने लगे आज मुझे मधुमास रे

तुझे आंचल मैं रखूँगी ओ सांवरे
काली अलकों से बाँधूँगी ये पांव रे
चल बैयाँ वो डालूं की छूटे नहीं
मेरा सपना साजन अब टूटे नहीं
मेंहदी रची हथेलियाँ, मेरे काजर-वाले नैन रे
(पिया) पल पल तुझे पुकारते, हो हो कर बेचैन रे

ओ मेरे सावन साजन, ओ मेरे सिंदूर
साजन संग सजनी बनी, मौसम संग मयूर
चार पहर की चांदनी, मेरे संग बिठा
अपने हाथों से पिया मुझे लाल चुनर उढ़ा
केसरिया धरती लगे, अम्बर लालम-लाल रे
अंग लगा कर साहिब रे, कर दे मुझे निहाल रे

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अपनी गंध नहीं बेचूंगा…(poems of Balkavi Bairagi)

चाहे सभी सुमन बिक जाएं
चाहे ये उपवन बिक जाएं
चाहे सौ फागुन बिक जाएं
पर मैं गंध नहीं बेचूंगा- अपनी गंध नहीं बेचूंगा

जिस डाली ने गोद खिलाया जिस कोंपल ने दी अरुणाई
लक्षमन जैसी चौकी देकर जिन कांटों ने जान बचाई
इनको पहिला हक आता है चाहे मुझको नोचें तोडें
चाहे जिस मालिन से मेरी पांखुरियों के रिश्ते जोडें

ओ मुझ पर मंडरानेवालों
मेरा मोल लगानेवालों
जो मेरा संस्कार बन गई वो सौगंध नहीं बेचूंगा
अपनी गंध नहीं बेचूंगा- चाहे सभी सुमन बिक जाएं।

मौसम से क्या लेना मुझको ये तो आएगा-जाएगा
दाता होगा तो दे देगा खाता होगा तो खाएगा
कोमल भंवरों के सुर सरगम पतझारों का रोना-धोना
मुझ पर क्या अंतर लाएगा पिचकारी का जादू-टोना
ओ नीलम लगानेवालों
पल-पल दाम बढानेवालों
मैंने जो कर लिया स्वयं से वो अनुबंध नहीं बेचूंगा
अपनी गंध नहीं बेचूंगा- चाहे सभी सुमन बिक जाएं।

मुझको मेरा अंत पता है पंखुरी-पंखुरी झर जाऊंगा
लेकिन पहिले पवन-परी संग एक-एक के घर जाऊंगा
भूल-चूक की माफी लेगी सबसे मेरी गंध कुमारी
उस दिन ये मंडी समझेगी किसको कहते हैं खुद्दारी
बिकने से बेहतर मर जाऊं अपनी माटी में झर जाऊं
मन ने तन पर लगा दिया जो वो प्रतिबंध नहीं बेचूंगा
अपनी गंध नहीं बेचूंगा- चाहे सभी सुमन बिक जाएं।

मुझसे ज्यादा अहं भरी है ये मेरी सौरभ अलबेली
नहीं छूटती इस पगली से नीलगगन की खुली हवेली
सूरज जिसका सर सहलाए उसके सर को नीचा कर दूं?
ओ प्रबंध के विक्रेताओं
महाकाव्य के ओ क्रेताओं
ये व्यापार तुम्हीं को शुभ हो मुक्तक छंद नहीं बेचूंगा
अपनी गंध नहीं बेचूंगा- चाहे सभी सुमन बिक जाएं।

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जब भी लिखता हूं मां…(poems of Balkavi Bairagi)

जब भी लिखता हूं मां

तो लेखनी सरल और सारस्वत शस्त्र

हो जाती है।

कलाई में कंपन नहीं होता

वो हो जाती है कर्मठ

उंगलियां दिपदिपाने लगती हैं

मानो गोवर्द्धन उठा लेंगी।

जब भी बोलता हूं ‘मां’
जबान से शब्द नहीं
शक्ति झरती है
खिल जाता है ब्रह्म कमल
भाषा वाणी हो जाती है

और वाणी? वाणी हो जाती है दर्शन।

जब भी सोचता हूं मां के बारे में

हृदय देवत्व से भर जाता है

अन्तर का कलुष मर जाता है।

याद आता है उसका कहा-

‘बेटा! ईश्वर ने जीभ और हृदय में

हड्डियां नहीं दीं।

क्यों?

फिर समझाती थी

‘जीभ से कोमल और मीठा बोलो

हृदय से निश्छल और निर्मल सोचो।’

मैं वात्सल्य और ममता से छलछलाती

उसकी कल्याणी आंखों में

खुद को देखता रह जाता।

फिर

अपने अमृत भरे वक्ष को

आंचल से ढंकती हुई मुझे

ममता-वात्सल्य और आंचल का

अर्थ समझाती

कर्म-कर्मठता-पुरुषार्थ-परमार्थ

पुण्य और परिश्रम का पाठ पढ़ाती

अपनी गाई लोरियों में

जागरण में छिपे मर्म को

नए सिरे से गाकर सुनाती।

मैं अबोध होकर सुनता रहता।

‘घर’ और ‘मकान ‘ का फर्क बताती

‘विवाह’ और ‘विश्वास’ का भेद सुनाती

‘परिवार’ और ‘गृहस्थी’ की गूढ़ ग्रंथियां सुलझाती।

जीतने पर इतराना नहीं

हारने पर रोना नहीं

गिरने पर धूल झटककर

फिर से उठ खड़े होना सिखाती

‘लक्ष्य’ और ‘आदर्श’ का फासला

तय करवाती।

डिग्रियों पर अपना दीक्षांत (दीक्षान्त) लिखती

कम बोले को ज्यादा समझने की

कला बताती।

पेड़-पत्तों और जड़ों का रिश्ता

धरती और आसमान से जोड़कर

मौसम और ऋतु से

आयु का गणित जोड़ती

मुझे भीतर तक मथ देती

मेरी नासमझी की बलैया लेती (poems of Balkavi Bairagi)

मैं समझने की कोशिश में

अवाक सुनता रहता।

एक दिन उसने सवाल किया

‘बता! मां के दूध को अमृत क्यों कहा?’

मैं चुप।

वो खिलखिलाकर बोली

‘अमृत का स्वाद किसी को पता नहीं

क्योंकि उसे किसी ने पिया या चखा नहीं।

मां के दूध को अमृत कहा ही इसलिए कि

उसे पीने वाले भी उसका स्वाद नहीं जानते।

ज्यों ही मुझे लगा कि

तुझे उसमें स्वाद आने लगा है

मैंने अपनी छातियों से तुझे दूर कर दिया था

बता! तब मेरे दूध का स्वाद कैसा था?’

मैंने चुप्पी तोड़ी- कहा

अमृत जैसा था।

वह खिलखिलाती रही

मैं हंसता रहा

मेरा सिर उसकी गोदी में था

वह आशीष देती रही

मेरे बाल सहलाती रही

उसकी आंखों से टप-टप टपकते आंसू

मेरे ललाट पर गिरकर

विधाता के लिखे मेरे भाग्य लेख को धो रहे थे

आकाश में चक्कर लगाते देवदूत

इस दृश्य पर न्योछावर हो रहे थे।

पिताजी कहते थे

तेरी मां निरक्षर जरूर है

पर अपढ़ नहीं है

जब तक वो तेरे पास है

तब तक तेरे जीवन में

कोई गड़बड़ नहीं है।

एक साकार समूचा सशरीर

ईश्वर होती है मां

अपने बच्चों के लिए ही

जागती और सोती है मां

अपने सपनों में भी वह

तुम्हारा और केवल तुम्हारा

सुखी भविष्य देखती है

यह मत सोचो कि वह

तुम्हारे और मेरे लिए

बस दो-चार रोटियां सेंकती हैं।

यहां साक्षात भगवान भी

मां की कोख और उसके

पेट से जन्म लेता है

वह भी मां के ऋण से उऋण

नहीं होता है।।

तेरी मां तेरा स्वर्ग है

मैं बस उस स्वर्ग का द्वारपाल

तू अपनी जीवन यात्रा का आदर्श तय कर

और अपने लक्ष्य को सम्हाल।

आज बिलकुल अकेला मैं

सोचता हूं

हाथ तो भगवान ने मुझे बस

दो ही दिए हैं

पर मातृ-शक्ति मेरी मां ने

कितने शस्त्र दे दिए हैं

मेरे इन दो हाथों में

इन्हें आजमाऊंगा मैं अपने जीवन संग्राम में

इन्हें नहीं घुमाऊंगा

किन्हीं जुलूसों और बारातों में। (poems of Balkavi Bairagi)

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