राष्ट्रपिता को समर्पित महाकवि दिनकर की कविता – जो कुछ था देय, दिया तुमने

0

जो कुछ था देय, दिया तुमने,
सब लेकर भी हम हाथ पसारे हुए
खड़े हैं आशा में;
लेकिन, छींटों के आगे जीभ नहीं खुलती,
बेबसी बोलती है आंसू की भाषा में। (Ramdhari Singh Dinkar Poem)

वसुधा को सागर से निकाल बाहर लाये,
किरणों का बन्धन काट उन्हें उन्मुक्त किया,
आंसुओं-पसीनों से न आग जब बुझ पायी,
बापू! तुमने आख़िर को अपना रक्त दिया।

बापू के लिए सुभाषित

(1)
छिपा दिया है राजनीति ने बापू! तुमको,
लोग समझते यही कि तुम चरखा-तकली हो।
नहीं जानते वे, विकास की पीड़ाओं से
वसुधा ने हो विकल तुम्हें उत्पन्न किया था। (Ramdhari Singh Dinkar Poem)

(2)
एक देश में बांध संकुचित करो न इसको,
गांधी का कर्तव्य-क्षेत्र दिक नहीं, काल है।
गांधी हैं कल्पना जगत के अगले युग की,
गांधी मानवता का अगला उद्विकास हैं।
(3)
बापू! तुमने होम दिया जिसके निमित्त अपने को,
अर्पित सारी भक्ति हमारी उस पवित्र सपने को।
क्षमा, शान्ति, निर्भीक प्रेम को शतशः प्यार हमारा,
उगा गये तुम बीज, सींचने का अधिकार हमारा।
निखिल विश्व के शान्ति-यज्ञ में निर्भय हमीं लगेंगे,
आयेगा आकाश हाथ में, सारी रात जगेंगे। (Ramdhari Singh Dinkar Poem)

(4)
सत्य है सापेक्ष्य, कोई भी नहीं यह जानता है,
सत्य का निर्णीत अन्तिम रूप क्या है? इसलिए,
आदमी जब सत्य के पथ पर कदम धरता,
वह उसी दिन से दुराग्रह छोड़ देता है।

(साभार: रामधारी सिंह ‘दिनकर ‘ द्वारा लिखित कविता ” (Ramdhari Singh Dinkar Poem) जो कुछ था देय, दिया तुमने”)

Hindi Poem : एक किताब है ज़िन्दगी बनते बिगड़ते हालातों का हिसाब है जिंदगी

Hindi Poem : ख़ुद को आख़िर इतना मजबूर क्यूँ होने दें

Hindi Poem : छिप-छिप अश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ बहाने वालों

-Mradul tripathi

Share.