ये हैं महाभारत की पटकथा लिखने वाले मुसलमान

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‘हम तो हैं परदेस में देस में निकला होगा चांद’ आपने जगजीत सिंह और चित्रा सिंह की आवाज़ में यह ग़ज़ल तो अवश्य सुनी होगी| इस ग़ज़ल के लेखक हैं राही मासूम रज़ा (Rahi Masoom Raza Top 4 Gazals ) | कई लोग ऐसे भी हैं जो उन्हें लोकप्रिय टीवी धारावाहिक के ‘महाभारत’ के पटकथा लेखक के रूप में जानते हैं| तब उनके मुसलमान होने के कारण उनका काफी विरोध हुआ था, इसके बाद उनकी लिखी महाभारत अमर हो गई|

आइए पढ़ें उनकी ग़ज़लें (Rahi Masoom Raza Top 4 Gazals ) :

Ibn-e-Insha की नज्मों का उठाएं लुत्फ़

देस में निकला होगा चांद (Rahi Masoom Raza)

हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चांद
अपनी रात की छत पर, कितना तनहा होगा चांद

जिन आँखों में काजल बनकर, तैरी काली रात
उन आँखों में आँसू का इक, कतरा होगा चांद

रात ने ऐसा पेंच लगाया, टूटी हाथ से डोर
आँगन वाले नीम में जाकर, अटका होगा चांद

चांद बिना हर दिन यूँ बीता, जैसे युग बीते
मेरे बिना किस हाल में होगा, कैसा होगा चांद

हिन्दी साहित्य जगत के सशक्त हस्ताक्षर सक्सेनाजी

अजनबी शहर के अजनबी रास्ते

अजनबी शहर के अजनबी रास्ते, मेरी तन्हाई पर मुस्कुराते रहे
मैं बहुत देर तक यूं ही चलता रहा, तुम बहुत देर तक याद आते रहे

ज़हर मिलता रहा ज़हर पीते रहे, रोज़ मरते रहे रोज़ जीते रहे
ज़िंदगी भी हमें आज़माती रही, और हम भी उसे आज़माते रहे

ज़ख़्म जब भी कोई ज़ेह्न-ओ-दिल पे लगा, ज़िंदगी की तरफ़ एक दरीचा खुला
हम भी गोया किसी साज़ के तार हैं, चोट खाते रहे गुनगुनाते रहे

कल कुछ ऐसा हुआ मैं बहुत थक गया, इसलिये सुन के भी अनसुनी कर गया
इतनी यादों के भटके हुए कारवाँ, दिल के ज़ख़्मों के दर खटखटाते रहे

सख़्त हालात के तेज़ तूफानों में , घिर गया था हमारा जुनूने-वफ़ा
हम चिराग़े-तमन्ना जलाते रहे, वो चिराग़े-तमन्ना बुझाते रहे

हवस के इस सहरा में बोले कौन

सब डरते हैं, आज हवस के इस सहरा में बोले कौन
इश्क तराजू तो है, लेकिन, इस पे दिलों को तौले कौन

सारा नगर तो ख्वाबों की मैयत लेकर श्मशान गया
दिल की दुकानें बंद पड़ी है, पर ये दुकानें खोले कौन

काली रात के मुँह से टपके जाने वाली सुबह का जूनून
सच तो यही है, लेकिन यारों, यह कड़वा सच बोले कौन

हमने दिल का सागर मथ कर काढ़ा तो कुछ अमृत
लेकिन आयी, जहर के प्यालों में यह अमृत घोले कौन

लोग अपनों के खूँ में नहा कर गीता और कुरान पढ़ें
प्यार की बोली याद है किसको, प्यार की बोली बोले कौन।

Javed Akhtar की बेहतरीन ग़ज़लें

क्‍या वो दिन भी दिन हैं…

क्‍या वो दिन भी दिन हैं जिनमें दिन भर जी घबराए
क्‍या वो रातें भी रातें हैं जिनमें नींद ना आए।

हम भी कैसे दीवाने हैं किन लोगों में बैठे हैं
जान पे खेलके जब सच बोलें तब झूठे कहलाए।

इतने शोर में दिल से बातें करना है नामुमकिन
जाने क्‍या बातें करते हैं आपस में हमसाए।।

हम भी हैं बनवास में लेकिन राम नहीं हैं राही
आए अब समझाकर हमको कोई घर ले जाए ।।

क्‍या वो दिन भी दिन हैं जिनमें दिन भर जी घबराए ।।

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