प्रेरणा पुरुष Ravindra Jain के चुनिंदा गीत और ग़ज़ल

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रवींद्र जैन (Poems of Ravindra Jain) उस संगीतकार का नाम है, जिन्होंने जन्मांध होने के बावजूद अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से संगीत जगत में स्वर्णिम अक्षरों में अपना नाम किया | ये वही संगीतकार है, जिन्होंने अपनी मधुर आवाज से टीवी पर प्रसारित होने वाले रामानंद सागर की रामायण में चौपाइयां गाई|

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पुरवैया के झोंके आये…

पुरवैया के झोंके आये
चन्दन बन की महक भी लाये
दूर वो निन्द्या रानी मुस्काये
मूँद लो नैना तो नैनों में आ जाये
पुरवैया के झोंके आये

नींद की दुल्हन बड़ी शर्मीली
उजियारे में न आये
कोई जो चौंके कोई कुछ बोले
तो रस्ते पे मुड़ जाये
दीप बुझा दो तो पल भर में आ जाये
मूँद लो नैना तो …

नींद की चिन्ता ले के जो जागे
उसको नींद न आये
फूल सा मनवा ले के जो सोये
उसको ही नींद सुलाये
छोड़ दो चिन्ता तो पल भर में आ जाये
मूँद लो नैना तो …

हम को जहाँ से क्या

अब रंज से ख़ुशी से बहार-ओ-ख़िज़ा से क्या
मह्व-ए-ख़याल यार हैं हम को जहाँ से क्या

उनका ख़याल उनकी तलब उनकी आरज़ू
जिस दिल में वो हो, माँगे किसी महरबाँ से क्या

हम ने चिराग़ रख दिया तूफ़ाँ के सामने
पीछे हटेगा इश्क़ किसी इम्तहाँ से क्या

कोई चले चले न चले हम तो चल पड़े
मंज़िल की धुन हो जिसको उसे कारवाँ से क्या

ये बात सोचने की है वो हो के महरबाँ
पूछेंगे हाल-ए-दिल तो कहेंगे ज़बाँ से क्या

शकील बदायूंनी, जिनके गीत आज भी सदाबहार हैं

शाम रंगीन हुई है तेरे आँचल की तरह…

शाम रंगीन हुई है तेरे आँचल की तरह
सुर्मई रंग सजा है तेरे काजल की तरह
पास हो तुम मेरे दिल के मेरे आँचल की तरह
मेरी आँखों में बसे हो मेरे काजल की तरह

मेरी हस्ती पे कभी यूँ कोई छाया ही न था
तेरे नज़्दीक मैं पहले कभी आया ही न था
मैं हूँ धरती की तरह तुम किसी बादल की तरह
सुर्मई रँग सजा है तेरे काजल की तरह

आस्मान है मेरे अर्मानों के दर्पन जैसे
दिल यूँ धड़के कि लगे बज उठे कँगन जैसे
मस्त हैं आज हवाएं किसी पायल कि तरह
सुर्मई रँग सजा है तेरे काजल की तरह

ऐसी रँगीन मुलाक़ात का मतलब क्या है
इन छलकते हुए जज़्बात का मतलब क्या है
आज हर दर्द भुला दो किसी पागल की तरह
सुर्मई रंग सजा है तेरे काजल की तरह

प्रो.अज़हर हाशमी की चुनिंदा कविताएं

सीमा सीमा सीमा…

सीमा सीमा सीमा सहने की भी है कोई सीमा
सीमा पे सिपाही बैठा है ज़रा बोल धीमा धीमा

कुछ लोग यहाँ पर लेते हैं कानों का नज़र से काम
नादान तू दीवानों की तरह क्यूँ लेता है मेरा नाम
सीमा ओ सीमा ओ सीमा धीरज की भी है कोई सीमा
बेहतर है कि हम तुम करवा लें अब चल कर अपना बीमा
सीमा …

तुम सर से लेकर पाँव तलक लगती हो मुझे ??? रात
अंजान पे भी ज़रा रखना नज़र फिर करना कोई आघात
सीमा सीमा सीमा चुप रहने की है कोई सीमा
कोइ भेद अगर खुल जाए कहीं तो बन जाएगा कीमा,
सीमा …

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