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कवि Upendra Kumar की कविताएं

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कवि उपेन्द्र कुमार ( Poems Of Upendra Kumar In Hindi) का जन्म  20 सितम्बर 1947 को बिहार के बक्सर में हुआ था| उन्हें काव्य रचना सम्मान (महर्षि गंधर्व वेद विश्व विद्यापीठ), साहित्यिक क्षेत्र में योगदान के लिए नेशनल प्रेस इंडिया द्वारा सम्मान, साहित्यिक कृति सम्मान (हिन्दी अकादमी, दिल्ली) और साहित्यकार सम्मान (हिन्दी अकादमी, दिल्ली) मिल चुका है|

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…जो मंजर न देखिए

चारों तरफ लहू का समंदर न देखिए
हिंसा ने कर दिया है जो मंजर न देखिए

बाहर की ये चमक ये दमक और कुछ नहीं
ये तो लिखा हुआ है कि अंदर न देखिए

ख़ुद को संभालना कोई मुश्किल नहीं यहाँ
चल ही दिए हैं आप तो मुड़कर न देखिए

जख़्मों पे फिर नमक ही छिड़कना है क्या ज़रूर
मिल कर बिछड़ रहे हैं तो हँसकर न देखिए

संभव नहीं है आपका रहना अगर यहाँ
लालच भरी नज़र से मेरा घर न देखिए

टकरा गई नज़र तो सँभल ही न पाओगे
इस शहर में दरीचों के अन्दर न देखिए

ये जो दर्द है अपने सीने में…

ये जो दर्द है अपने सीने में, ये नया भी है, ये अजीब भी
कि उगा है दिल की ज़मीन से ये दिमाग से है क़रीब भी

जो क़दम हमारे ये तेज़ हैं ये उसी उम्मीद का फैज है
जो दिखाए मौत की घाटियाँ जो बनी है अपनी सलीब भी

यूँ जले नगर कि शवों को भी वो कफ़न न कोई दे सका
कि पहुँच के चाँद प आदमी, रहा किस कदर गरीब भी

मेरी पूँजी तमाम दर्द थी उसे किस तरह कोई जानता
ये जो दर्द होता ज़मीन-सा कोई माप लेती जरीब भी

कोई और वादे कीजिए कि समय का दु:ख तो दराज है
न ये वक़्त ही टलने की चीज़ है, न बदल सकेगा नसीब भी।

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वादे थे फिर वादे…

वादे थे फिर वादे ही वो टूट गए तो क्या कीजे
साथी थे फिर साथी ही वो छूट गए तो क्या कीजे

तन-मन से प्यारे थे सपने चाह ने जो दिखलाए
सोच की आँखें खुल जाने पर टूट गए तो क्या कीजे

प्यार के वो अनमोल खजाने आस रही तो अपने थे
उन्हें निराशा के अँधियारे लूट गए तो क्या कीजे

जीवन नैया के जो चप्पू हमने मिलकर थामे थे
अनहोनी के तेज़ भँवर मे टूट गए तो क्या कीजे

खुशहाली ने जिनकी खुशी में घर संसार सजाया था
बुरे वक़्त में मीत वही जो रूठ गए तो क्या कीजे

आस हवा का दामन निकली हम बेचारे क्या करते
इंतज़ार में भाग हमारे फूट गए तो क्या कीजे

दर्द के रिश्ते इनसानों में जब तक थे मज़बूत रहे
प्यार के धागे कोमल थे जो टूट गए तो क्या कीजे

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