कविता – मै नदिया हूँ

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1 – मै नदिया हूँ (Main Madiya Hoon)
चुलबुली, आज़ाद
निराली हूँ
ज़मीन पर रहकर
आसमां को समाती
मुझसे खुशियां
मुझसे ही दुःख
लहराती हूँ पर
उड़ नहीं पाती हूँ
मन आये तो
राह बदलती हूँ
सागर की तरह नहीं
जो राह न बदल सके
मैं नदिया हूँ।


2 – बदलो को चीरती हुई
खूबसूरत धूप सहलाती हुई मुझे
कह रही है जी ले इन लम्हो को
ये पल दो पल की सुहानी धूप
कब चिलचिलाती में बदल जाए?
तो खोल पंख और तू भी चिर दे
इस खुले आसमान को।
ये आसमान भी तेरा है
और तू भी इसकी
तो अपना ले बेझिझक इसे
चहका दे इस आसमान को
अपनी चहक से।
बस तू उड़ जा और अपना
ले इस आसमान को।

नेहा लिम्बोदिया ( इंदौर )

अब ढलते सूरज को भी है दंडवत प्रणाम

मैय्यत के बहाने…..

…और होगी हर दिन जगमगाती दिवाली

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