घुट-घुट कर जीना छोड़ दे, तू रुख हवाओं का मोड़ दे

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घुट-घुट कर जीना छोड़ दे, तू रुख हवाओं का मोड़ दे,
हिम्मत की अपनी कलम उठा, लोगों के भरम को तोड़ दे, (Ghut Ghut Kar Jeena Chhod De)

तू छोड़ ये आंसू उठ हो खड़ा, मंजिल की ओर अब कदम बढ़ा,
हासिल कर इक मुकाम नया, पन्ना इतिहास में जोड़ दे,

उठना है तुझे नहीं गिरना है, जो गिरा तो फिर से उठना है,
अब रुकना नहीं इक पल तुझको, बस हर पल आगे बढ़ना है,

राहों में मिलेंगे तूफ़ान कई, मुश्किलों के होंगे वार कई,
इन सबसे तुझे न डरना है, तू लक्ष्य पे अपने जोर दे, (Ghut Ghut Kar Jeena Chhod De)

चल रास्ते तू अपने बना, छू लेना अब तू आसमान,
धरती पर तू रखना कदम, बनाना है अपना ये जहाँ,

किसी के रोके न रुक जाना तू, लकीरें किस्मत की खुद बनाना तू,
कर मंजिल अपनी तू फतह, कामयाबी के निशान छोड़ दे,

घुट-घुट कर जीना छोड़ दे, तू रुख हवाओं का मोड़ दे,
हिम्मत की अपनी कलम उठा, लोगों के भरम को तोड़ दे.

 

(इंटरनेट के माध्यम से प्राप्त कविता “घुट घुट कर जीना छोड़ दे”)

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