Mahadevi Varma Poems : काव्य जगत की ‘महादेवी’ थीं महादेवी वर्मा

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महादेवी वर्मा (Mahadevi Varma Beautiful Poems) का जन्म 26 मार्च, 1907 को होली के दिन फरुखाबाद (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। आपकी प्रारंभिक शिक्षा मिशन स्कूल, इंदौर में हुई। महादेवी 1929 में बौद्ध दीक्षा लेकर भिक्षुणी बनना चाहतीं थीं, लेकिन महात्मा गांधी के संपर्क में आने के बाद आप समाज-सेवा में लग गईं। आपने संपूर्ण जीवन प्रयाग इलाहाबाद में ही रहकर साहित्य की साधना की और आधुनिक काव्य जगत में आपका योगदान अविस्मरणीय रहेगा|

 पढ़ें उनकी कविताएं (Mahadevi Varma Beautiful Poems) :

ओम प्रकाश आदित्य की मनमोहक कविताएं

मैं कण-कण को जान चली

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अलि, मैं कण-कण को जान चली

सबका क्रन्दन पहचान चली

जो दृग में हीरक-जल भरते

जो चितवन इन्द्रधनुष करते

टूटे सपनों के मनको से

जो सुखे अधरों पर झरते,

जिस मुक्ताहल में मेघ भरे

जो तारो के तृण में उतरे,

मै नभ के रज के रस-विष के

आँसू के सब रँग जान चली।

जिसका मीठा-तीखा दंशन,

अंगों मे भरता सुख-सिहरन,

जो पग में चुभकर, कर देता

जर्जर मानस, चिर आहत मन;

जो मृदु फूलो के स्पन्दन से

जो पैना एकाकीपन से,

मै उपवन निर्जन पथ के हर

कंटक का मृदु मत जान चली।

गति का दे चिर वरदान चली।

जो जल में विद्युत-प्यास भरा

जो आतप मे जल-जल निखरा,

जो झरते फूलो पर देता

निज चन्दन-सी ममता बिखरा;

जो आँसू में धुल-धुल उजला;

जो निष्ठुर चरणों का कुचला,

मैं मरु उर्वर में कसक भरे

अणु-अणु का कम्पन जान चली,

प्रति पग को कर लयवान चली।

नभ मेरा सपना स्वर्ण रजत

जग संगी अपना चिर विस्मित

यह शुल-फूल कर चिर नूतन

पथ, मेरी साधों से निर्मित,

इन आँखों के रस से गीली

रज भी है दिल से गर्वीली

मै सुख से चंचल दुख-बोझिल

क्षण-क्षण का जीवन जान चली!

मिटने को कर निर्माण चली!

गांधीजी ने मैथिलीशरण गुप्त को दी थी ‘राष्ट्रकवि’ की पदवी

जब यह दीप थके तब आना।

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जब यह दीप थके तब आना।

यह चंचल सपने भोले है,
दृग-जल पर पाले मैने, मृदु
पलकों पर तोले हैं;
दे सौरभ के पंख इन्हें सब नयनों में पहुँचाना!

साधें करुणा-अंक ढली है,
सान्ध्य गगन-सी रंगमयी पर
पावस की सजला बदली है;
विद्युत के दे चरण इन्हें उर-उर की राह बताना!

यह उड़ते क्षण पुलक-भरे है,
सुधि से सुरभित स्नेह-धुले,
ज्वाला के चुम्बन से निखरे है;
दे तारो के प्राण इन्ही से सूने श्वास बसाना!

यह स्पन्दन है अंक-व्यथा के
चिर उज्ज्वल अक्षर जीवन की
बिखरी विस्मृत क्षार-कथा के;
कण का चल इतिहास इन्हीं से लिख-लिख अजर बनाना!

लौ ने वर्ती को जाना है
वर्ती ने यह स्नेह, स्नेह ने
रज का अंचल पहचाना है;
चिर बन्धन में बाँध इन्हें धुलने का वर दे जाना!

मैं नीर भरी दु:ख की बदली!

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बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी साहित्यकार राही मासूम रज़ा

मैं नीर भरी दु:ख की बदली!

स्पंदन में चिर निस्पंद बसा,
क्रन्दन में आहत विश्व हंसा,
नयनों में दीपक से जलते,
पलकों में निर्झरिणी मचली!

मेरा पग-पग संगीत भरा,
श्वासों में स्वप्न पराग झरा,
नभ के नव रंग बुनते दुकूल,
छाया में मलय बयार पली,

मैं क्षितिज भॄकुटि पर घिर धूमिल,
चिंता का भार बनी अविरल,
रज-कण पर जल-कण हो बरसी,
नव जीवन अंकुर बन निकली!

पथ को न मलिन करता आना,
पद चिन्ह न दे जाता जाना,
सुधि मेरे आगम की जग में,
सुख की सिहरन बन अंत खिली!

विस्तृत नभ का कोई कोना,
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना इतिहास यही
उमड़ी कल थी मिट आज चली!

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