मुझको यक़ीं है सच कहती थीं जो भी अम्मी कहती थीं

0

मुझको यक़ीं है सच कहती थीं जो भी अम्मी कहती थीं
जब मेरे बचपन के दिन थे चाँद में परियाँ रहती थीं(Best Javed Akhtar Poetry 2019)

एक ये दिन जब अपनों ने भी हमसे नाता तोड़ लिया
एक वो दिन जब पेड़ की शाख़ें बोझ हमारा सहती थीं

एक ये दिन जब सारी सड़कें रूठी-रूठी लगती हैं
एक वो दिन जब ‘आओ खेलें’ सारी गलियाँ कहती थीं

एक ये दिन जब जागी रातें दीवारों को तकती हैं
एक वो दिन जब शामों की भी पलकें बोझल रहती थीं

एक ये दिन जब ज़हन में सारी अय्यारी की बातें हैं
एक वो दिन जब दिल में भोली-भाली बातें रहती थीं

एक ये दिन जब लाखों ग़म और काल पड़ा है आँसू का
एक वो दिन जब एक ज़रा सी बात पे नदियाँ बहती थीं

एक ये घर जिस घर में मेरा साज़-ओ-सामाँ रहता है
एक वो घर जिस घर में मेरी बूढ़ी नानी रहती थीं

(साभार: जावेद अख़्तर द्वारा लिखित रचना “मुझको यक़ीं है सच कहती थीं”)(Best Javed Akhtar Poetry 2019)

Poetry : ओ मस्तक विराट, अभी नहीं मुकुट और अलंकार

Best Gulzar Poetry 2019 : गुलज़ार साहब की शानदार कविताये

Tahir Faraz Best Poetry : जिस ने तेरी याद में सजदे किए थे ख़ाक पर…

-Mradul tripathi

Share.