कुछ देर ठहरती संग मेरे, श्रृंगार तेरा मैं कर देता

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कुछ देर ठहरती संग मेरे, श्रृंगार तेरा मैं कर देता।

आलिंगन में लेकर तुझको यौवन तेरा मैं गढ़ देता।।

कुछ देर ठहरती संग मेरे…

वह प्रेम प्रियतमा जैसा था, वह रूप रुक्मिणी जैसा था।

वह चंद्ररात की बेला थी, वह दृश्य स्वपन के जैसा था।।

कुछ देर ठहरती संग मेरे…

मोह भरा था उस मंथन में, अश्रु कहां से आए थे?

मेरी चाहत के दर्पण में कुछ पुष्प तभी मुरझाए थे।

तू कह देती मैं सुन लेता, तू कह देती मैं बुन लेता।

उस विरह की प्रेम कहानी को, तेरे होंठों से चुन लेता।।

खामोशी थी तेरी बातों में, मैं बिन बोले ही पढ़ लेता।

आलिंगन में लेकर तुझको यौवन तेरा मैं गढ़ देता।।

कुछ देर ठहरती संग मेरे…

मैं हूँ अब भी उस शेष प्रेम संग, मेरे टूटे हुए ह्रदय संग।

अपनी प्रेम कहानी के उलझे और झूठे किस्सों संग।।

कुछ देर ठहरती संग मेरे….

शिथिल कहां है भाव प्रेम का, मुझे चाहिए छांव प्रेम का।

सूख चुके इस किस्से पर मैं मीठा मलमल मंढ़ देता।

कुछ देर ठहरती संग मेरे श्रृंगार तेरा मैं कर देता।।

एक बार पलटके देखा होता मुझको तूने जो जी भरके।

मृगनयनी सी तेरी आँखों में मैं प्यार का काजल भर देता।।

कुछ देर ठहरती संग मेरे, श्रृंगार तेरा मैं कर देता।

(साभार: मुकेश तिवारी द्वारा लिखित कविता “कुछ देर ठहरती संग मेरे.”)

-Mradul tripathi

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