Hindi Poetry : पीठ पीछे से हुए वार से डर लगता है

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हिन्दी ग़ज़ल की दुनिया के एक जाने-पहचाने नाम ज़हीर कुरैशी को साहित्य की दुनिया से प्रेम करने वाला हर एक शख्स अच्छे से जानता होगा। एक ग्वालियर में रहते हुए उनका सानिध्य और आशीर्वाद मेरे लिए एक बेशकीमती तोहफा रहा है। आज उन्हीं की कुछ रचनाएँ –

अथक प्रयास के उजले विचार से निकली

अथक प्रयास के उजले विचार से निकली

हमारी जीत, निरंतर जुझार से निकली

हरेक युद्ध किसी संधि पर समाप्त हुआ

अमन की राह हमेशा प्यार से निकली

जो मन का मैल है, उसको तो व्यक्त होना है

हमारी कुण्ठा हजारों प्रकार से निकली

ये अर्थ—शास्त्र भी कहता है, अपनी भाषा में—

नकद की राह हमेशा उधार से निकली

नजर में आने की उद्दंड युक्ति अपनाकर ,

वो चलते—चलते अचानक कतार से निकली

हमारी चादरें छोटी, शरीर लंबे है

हमारे खर्च की सीमा पगार से निकली

ये सोच कर ही तुम्हें रात से गुजरना है

सुहानी भोर सदा अंधकार से निकली

आँसुओं की धार को बंदी बना लेते हैं लोग

आँसुओं की धार को बन्दी बना लेते हैं लोग

ये करिश्मा है कि फिर भी मुस्कुरा लेते हैं लोग !

स्वप्न को साकार करने की कला सीखे बिना

आने वाले कल को सपनों में सजा लेते हैं लोग

एक भी अन्याय का करते नहीं तन कर विरोध

खुद को कालीनों की शैली में बिछा लेते हैं लोग

चाल चलने से अगर हो ‘मात’ की संभावना

राजनैतिक दुश्मनों से भी निभा लेते हैं लोग

आज ये फल चख लिया, कल दूसरा फल चख लिया,

अपनी इस आवारगी का भी मजा लेते हैं लोग

इस तरह अपराध करते हैं कि गायब हो गवाह

न्याय घर में शक का पूरा फायदा लेते हैं लोग

पीठ पीछे से हुए वार से डर लगता है

मुझको हर दोस्त से,हर यार से डर लगता है

चाहे पत्नी करे या प्रेमिका अथवा गणिका,

प्यार की शैली में, व्यापार से डर लगता है

संविधानों की भी रक्षा नहीं कर पाई जो

मूक दर्शक बनी सरकार से डर लगता है

इस महानगरी में करना पड़े कब और कहाँ

व्यस्तताओं भरे अभिसार से डर लगता है

कोई तलवार कभी काट न पाई जिसको

वक्त की नदिया की उस धार से डर लगता है

एक झटके में चुका दे जो समूची कीमत

रूप को ऐसे खरीदार से डर लगता है

हम चमत्कारों में विश्वास तो करते हैं, मगर

हम गरीबों को चमत्कार से डर लगता है

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