Hindi Poetry : कभी-कभी वो हमें बे-सबब भी मिलता है

0

परवीन शाकिर (Best Poems Of Parveen Shakir ) पाकिस्तान की बेहद मशहूर शायरा थीं। वे 24 नवम्बर 1952 को पाकिस्तान के कराची में जन्मी थी। उनका पूरा नाम सैयदा परवीन शाकिर है। उनकी ग़ज़लें आज भी लोगों को सुकून देती हैं। परवीन शाकिर (Parveen Shakir) की ग़ज़लें आज भी उर्दू शायरी में एक युग का प्रतिनिधित्व करती हैं। परवीन शाकिर (Parveen Shakir) उर्दू-काव्य की अमूल्य निधि हैं।

Best Poems Of Parveen Shakir :

1
हवा-ए-ताज़ा में फिर जिस्म ओ जाँ बसाने का,
दरीचा खोलें कि है वक़्त उस के आने का

असर हुआ नहीं उस पर अभी ज़माने का,
ये ख़्वाब-ज़ाद है किरदार किस फ़साने का

कभी-कभी वो हमें बे-सबब भी मिलता है,
असर हुआ नहीं उस पर अभी ज़माने का

अभी मैं एक महाज़-ए-दिगर पे उलझी हूँ,
चुना है वक़्त ये क्या मुझ को आज़माने का

कुछ इस तरह का पुर-असरार है तेरा लहजा
कि जैसे राज़-कुशा हो किसी ख़ज़ाने का…

2
जला दिया शजर-ए-जाँ कि सब्ज़-बख़्त न था,
किसी भी रुत में हरा हो ये वो दरख़्त न था

वो ख़्वाब देखा था शहज़ादियों ने पिछले पहर,
फिर उस के बाद मुक़द्दर में ताज ओ तख़्त न था

ज़रा से जब्र से मैं भी तो टूट सकती थी,
मेरी तरह से तबियत का वो भी सख़्त न था

मेरे लिए तो वो ख़ंजर भी फूल बन के उठा,
ज़बान सख़्त थी लहजा कभी करख़्त न था

अंधेरी रातों के तन्हा मुसाफ़िरों के लिए,
दिया जलाता हुआ कोई साज़-ओ-रख़्त न था

गए वो दिन कि मुझी तक था मेरा दुख महदूद,
ख़बर के जैसा ये अफ़्साना लख़्त-लख़्त न था…

3
खुलेगी उस नज़र पे चश्म-ए-तर आहिस्ता-आहिस्ता,
किया जाता है पानी में सफ़र आहिस्ता आहिस्ता

कोई ज़ंजीर फिर वापस वहीं पर ले के आती है,
कठिन हो राह तो छूटता है घर आहिस्ता आहिस्ता

बदल देना है रस्ता या कहीं पर बैठ जाना है,
कि थकता जा रहा है हम-सफ़र आहिस्ता आहिस्ता

ख़लिश के साथ इस दिल से न मेरी जाँ निकल जाए,
खिंचे तीर-ए-शनासाई मगर आहिस्ता आहिस्ता

हवा से सर-कशी में फूल का अपना जियां देखा,
सो झुकता जा रहा है अब ये सर आहिस्ता आहिस्ता

मेरी शोला-मिज़ाजी को वो जंगल कैसे रास आए,
हवा भी सांस लेती हो जिधर आहिस्ता आहिस्ता

4
क्या करे मेरी मसीहाई भी करने वाला,
ज़ख़्म ही ये मुझे लगता नहीं भरने वाला

ज़िंदगी से किसी समझौते के बा-वस्फ़ अब तक
याद आता है कोई मारने-मरने वाला

उस को भी हम तेरे कूचे में गुज़ार आए हैं,
ज़िंदगी में वो जो लम्हा था संवरने वाला

शाम होने को है और आंख में इक ख़्वाब नहीं,
कोई इस घर में नहीं रौशनी करने वाला

दस्तरस में हैं अनासिर के इरादे किस के,
सो बिखर के ही रहा कोई बिखरने वाला

उस का अंदाज़-ए-सुख़न सब से जुदा था शायद,
बात लगती हुई लहजा वो मुकरने वाला

इसी उम्मीद पर हर शाम बुझाए हैं चराग़,
एक ताज़ा है सर-ए-बाम उभरने वाला…

परवीन शाकिर

 

Maithili Sharan Gupt Poetry : हम कौन थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगे अभी

Happy Birthday Gulzar : गुलज़ार की 5 बेहतरीन कविताएं!

Best Poems Of Faiz Ahmad Faiz : हर क़दम हम ने आशिक़ी की है…

Share.