Hindi Poetry : मैं गिरा तो मसला बन कर खड़ा हो जाऊंगा…

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लम्हा-लम्हा अपनी ज़हरीली बातों से डसता था
वो मेरा दुश्मन हो कर भी मेरे घर में बसता था

बाप मरा तो बच्चे रोटी के टुकड़े को तरस गए
एक तने से कितनी शाख़ों का जीवन वाबस्ता था,

अफवाहों के धुएँ ने कोशिश की है कालक मलने की
वो बिकने की शय होता तो हर क़ीमत पर सस्ता था,

इक मंज़र में पेड़ थे जिन पर चंद कबूतर बैठे थे
इक बच्चे की लाश भी थी जिस के कंधे पर बस्ता था,

जिस दिन शहर जला था उस दिन धूप में कितनी तेज़ी थी,
वर्ना इस बस्ती पर ‘अंजुम’ बादल रोज़ बरसता था….

– अंजुम रहबर

Hindi Poetry :  न मिल सका कहीं ढूँढ़े से भी निशान मेरा…

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अपने हर लफ़्ज़ का, ख़ुद आईना हो जाऊँगा
उस को छोटा कह के, मैं कैसे बड़ा हो जाऊँगा,

तुम गिराने में लगे थे, तुम ने सोचा ही नहीं
मैं गिरा तो मसला बन कर खड़ा हो जाऊँगा,

मुझ को चलने दो अकेला, है अभी मेरा सफ़र
रास्ता रोका गया तो, क़ाफ़िला हो जाऊँगा,

सारी दुनिया की नज़र में, है मेरा अहद-ए-वफ़ा
इक तेरे कहने से, क्या मैं बेवफ़ा हो जाऊँगा…

– वसीम बरेलवी

Balswaroop Raahi : बाल स्वरूप राही की कविताएं

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लहू न हो तो क़लम तरजुमाँ नहीं होता
हमारे दौर में आँसू ज़ुबाँ नहीं होता

जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटायेगा
किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता

ये किस मक़ाम पे लाई है मेरी तनहाई
के मुझ से आज कोई बदगुमाँ नहीं होता

मैं उसको भूल गया हूँ ये कौन मानेगा
किसी चराग़ के बस में धुआँ नहीं होता

‘वसीम’ सदियों की आँखों से देखिए मुझ को
वो लफ़्ज़ हूँ जो कभी दास्ताँ नहीं होता

– वसीम बरेलवी

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