Hindi Poetry :  न मिल सका कहीं ढूँढ़े से भी निशान मेरा…

0

हिंदी साहित्य के जाने माने ग़ज़लकार, व्यंग्यकार, कहानीकार, नाटककार और स्वतंत्र लेखक निश्तर ख़ानक़ाही (Nishtar Khanshahi Best Poems) की कविताएं संजीदगी और दुख-दर्द बयां करती है।

Balswaroop Raahi : बाल स्वरूप राही की कविताएं

आइये पढ़ते हैं उनकी कुछ खास कविताएं (Nishtar Khanshahi Best Poems) :

‘मीर’ कोई था ‘मीरा’ कोई लेकिन उनकी बात अलग

छोड़ो मोह! यहाँ तो मन को बेकल बनना पड़ता है
मस्तों के मयख़ाने को भी मक़तल बनना पड़ता है

सारे जग की प्यास बुझाना, इतना आसाँ काम है क्या?
पानी को भी भाप में ढलकर बादल बनना पड़ता है

जलते दिए को लौ ही जाने उसकी आँखें जानें क्या?
कैसी-कैसी झेल के बिपता, काजल बनना पड़ता है

‘मीर’ कोई था ‘मीरा कोई लेकिन उनकी बात अलग
इश्क़ न करना, इश्क़ में प्यारे पागल बनना पड़ता है

शहर नहीं थे, गाँव से पहले जंगल बनना पड़ता है

“निश्तर” साहब! हमसे पूछो, हमने ज़र्बे झेली हैं
घायल मन की पीड़ समझने घायल बनना पड़ता है

कविता : यह धरती कितना देती है…

तेज़ रौ पानी की तीख़ी धार पर चलते हुए…

तेज़ रौ पानी की तीखी धार पर चलते हुए
कौन जाने कब मिलें इस बार के बिछुड़े हुए ।

अपने जिस्मों को भी शायद खो चुका है आदमी
रास्तों में फिर रहे हैं पैरहन बिखरे हुए ।

अब ये आलम है कि मेरी ज़िंदगी के रात-दिन
सुबह मिलते हैं मुझे अख़बार में लिपटे हुए ।

अनगिनत जिस्मों का बहरे-बेकराँ  है और मैं
मुदद्तें गुज़री हैं अपने आप को देखे हुए ।

किन रुतों की आरज़ू शादाब रखती है उन्हें
ये खिज़ाँ की शाम और ज़ख़्मों के वन महके हुए ।

काट में बिजली से तीखी, बाल से बारीक़तर
ज़िंदगी गुज़री है उस तलवार पर चलते हुए ।

पुरुषोत्तम अब्बी ‘आज़र’ की दिल को छू लेने वाली कविताएं

न मिल सका कहीं ढूँढ़े से भी निशान मेरा…

न मिल सका कहीं ढूँढ़े से भी निशान मेरा ।
तमाम रात भटकता रहा गुमान मेरा ।

मैं घर बसा के समंदर के बीच सोया था ।
उठा तो आग की लपटों में था मकान मेरा ।

जुनूँ  न कहिए उसे ख़ुद अज़ीयती  कहिए
बदन तमाम हुआ है लहूलुहान मेरा ।

हवाएँ गर्द की सूरत उड़ा रही हैं मुझे
न अब ज़मीं ही मेरि है न आसमान मेरा ।

धमक कहीं हो लरज़ती हैं खिड़कियाँ मेरी
घटा कहीं हो टपकता है साएबान मेरा ।

मुसीबतों के भँवर में पुकारते हैं मुझे
अजीब लोग हैं लेते हैं इम्तेहान मेरा ।

किसे ख़तूत  लिखूँ हाले दिल सुनाऊँ किसे
न कोई हर्फ़ शनासा, न हम-ज़ुबान मेरा ।

Share.