छिड़ी हुई है हाथ की उंगलियों में लड़ाई

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छिड़ी हुई है हाथ की उंगलियों में लड़ाई

चारों कर रही हैं, अपनी महत्वता की अगुवाई

Hindi Poem : एक किताब है ज़िन्दगी बनते बिगड़ते हालातों का हिसाब है जिंदगी

मध्यमा बोली, मैं हूं महान

कद में हूं ऊंची, तुम करो सम्मान

हो तुम मेरे, पहरेदार

मेरी रक्षा, तुम्हारा है काम

 

कनिष्ठा बोली, ज़रा करो नमस्कार

मेरे पीछे, दिखते हो तुम चार..

कद में चाहे, मैं छोटी हूं,

लेकिन, प्रथम मैं आती हूं।

 

कनिष्ठा पर हंसती, अनामिका

बोली मैं हूं, सौन्दर्य की मलिका

मुझपे चढ़ता अंगुठी का ताज

रिश्तों को मिलता, मुझसे नाम।

उन परछाइयों को, जो अभी अभी चाँद की रसवंत गागर से गिर

नाम के तर्क पर, तर्जनी बोली

मुझसे उपयोगी, तुम में से कोई नहीं

मैं दर्शाती, मैं दिखाती, आदेश देना, है मेरा काम

इसीलिए मैं हूं, सब में महान

 

चुपचाप अलग किनारे बैठा

आया अंगुठा, किया सवाल

क्या कभी है, तुम सबने सोचा

मेरे बिना, क्या कोई काम होता

न उठा पाते, कोई सामान

न नल बंद करना होता, इतना आसान

 

खिसिया के अंगुठे से बोली उंगलियां…

क्या तुम्हें लगता है तुम हो महान

मुझको यक़ीं है सच कहती थीं जो भी अम्मी कहती थीं

अंगुठा बोला…

न मैं हूं महान… न तुम हो महान

हमारा साथ ही है, हमारा अभिमान

जो न होता हम में से कोई पांच

तो नहीं बन पाता, सुंदर हाथ।

(साभार: कामिनी सिंह द्वारा लिखित कविता “न मैं हूं महान… न तुम हो महान”)

-Mradul tripathi

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