हास्य-कवि प्रदीप चौबे की चुनिंदा रचनाएं

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‘हास्य-गैस सिलेंडर’ के नाम से जाने जाने वाले प्रदीप ( Pradeep Choubey Best Poems ) नॉन स्टॉप हंसी, खास शैली , अंदाज़े-बयाँ , अनूठा तरीका और एक अलग रंग के लिए कवी सम्मेलनों की शान रहें हास्य-कवि प्रदीप चौबे का दुखद निधन में ग्वालियर हो गया है| साहित्य जगत आज गम में डूब गया है|  मध्यप्रदेश के ग्वालियर शहर के रहने वाले हास्य कवि प्रदीप चौबे की कुछ चुनिंदा कविताओं के जरिये आज हम भी उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पण कर रहें है|

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Pradeep Choubey Best Poems :

गोलमाल

हर तरफ गोलमाल है साहब
आपका क्या ख़याल है साहब

कल का ‘भगुआ’ चुनाव जीता तो,
आज ‘भगवत दयाल’ है साहब

लोग मरते रहें तो अच्छा है,
अपनी लकड़ी की टाल है साहब

आपसे भी अधिक फले-फूले
देश की क्या मजाल है साहब

मुल्क मरता नहीं तो क्या करता
आपकी देख भाल है साहब

रिश्वतें खाके जी रहे हैं लोग
रोटियों का अकाल है साहब

जिस्म बिकते हैं, रूह बिकती हैं,
ज़िंदगी का सवाल है साहब

आदमी अपनी रोटियों के लिए
आदमी का दलाल है साहब

इसको डेंगू, उसे चिकनगुनिया
घर मेरा अस्पताल है साहब

तो समझिए पात-पात हूं मैं,
वे अगर डाल-डाल हैं साहब

गाल चांटे से लाल था अपना
लोग समझे गुलाल है साहब

मौत आई तो ज़िंदगी ने कहा-
‘आपका ट्रंक काल है साहब’

मरता जाता है, जीता जाता है
आदमी का कमाल है साहब

इक अधूरी ग़ज़ल हुई पूरी
अब तबीयत बहाल है साहब ।

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कवि प्रदीप, जिनका गीत सुन नेहरुजी की आँखों में आ गए थे आंसू

भिखारी – 1

जनता क्लास के
थ्री टायर से
उतर कर
हमने
बासी पूडियों का पैकेट
जैसे ही
भिखारी को बढाया
भिखारी
हाथ उठा कर बड़बड़ाया
आगे जाओ बाबा
मैं र्फस्ट क्लास के यात्रियों का
भिखारी हूँ।

भिखारी – 2

एक भिखारी ने
हमसे भीख माँग कर
हमारा
सम्मान बढ़ाया
बोला –
बाबूजी
गरीब को आठ आने
हमने कहा –
सिर्फ आठ आने?
इस जमाने में
आठ आने के
क्या माने
काफी भुखमरा भिखारी लगता है
अबे!
भीख सामने वालो की
हैसियत को
देख कर माँगी जाती है
कम से कम
पाँच रूपये तो माँगता!
भिखारी बोला –
ज़रूर माँगता
मगर आपको
कौन नहीं जानता
टी वी पर देख चुका हूँ
मुझे पता है आप कवि हैं
मगर हम भी पुराने अनुभवी हैं
धंधे में रिस्क नहीं उठाते
आपसे पाँच रूपया माँगता
तो आप खुद
मेरी बगल में बैठ जाते
मेरा तो कारोबार ही बिगड़ जाता
आप तो
मजमा जमा लेते
मैं रसातल में पहुँच जाता

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व्यवस्था

पलक झपकते ही
हमारी अटैची साफ हो गई
झपकी खुली
तो सामने लिखा था –
इस स्टेशन पर
सफाई का
मुफ्त प्रबंध है!

2
होनी थी‚
हो गई
डाक–व्यवस्था पर
जो फिल्म बनी थी
वह डाक में ही
कहीं खो गई।

3
रात
बारह बजे के बाद
आई एक
पुलिस वाले की आवाज़
किसी ने सुना – जागते रहो
किसी ने सुना – भागते रहो

इनक्वायरी काउंटर पर
किसी को भी न पाकर
हमने प्रबंधक से कहा जाकर –
‘ पूछताछ बाबू सीट पर नहीं है
उसे कहाँ ढूंढें? ‘
जवाब मिला –
‘पूछताछ काउंटर पर पूछें!’

5
सरकारी बस थी
सरकती न थी‚
बस‚
थी।

6
सरकारी बस की
भीड़ में
वह ऐसा फँस गया
कि फिर न निकला
वहीं बस गया

7
पुल‚
पहली बरसात में बह गए
केवल
बनाने वाले रह गए!

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