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गुलज़ार, जिनका अंदाज़े बयां सबसे अलग है

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सम्पूर्ण सिंह कालरा उर्फ़ गुलज़ार भारतीय गीतकार,कवि, पटकथा लेखक, फ़िल्म निर्देशक तथा नाटककार हैं। उनकी कविताओं, गीतों और ग़ज़लों में उर्दू पर उनकी गहरी पकड़ दिखाई देती है| उनका अंदाज़े बयां सबसे अलग है, सबसे जुदा है| गुलज़ार को हिंदी सिनेमा के लिए कई प्रसिद्ध अवार्ड्स से भी नवाजा जा चुका है। उन्हें 2004 में भारत के सर्वोच्च सम्मान पद्मभूषण से भी नवाजा जा चूका है।  इसके अलावा उन्हें 2009 में डैनी बॉयल निर्देशित फिल्म स्लम्डाग मिलियनेयर मे उनके द्वारा लिखे गीत जय हो के लिये उन्हे सर्वश्रेष्ठ गीत का ऑस्कर पुरस्कार पुरस्कार मिल चुका है। इसी गीत के लिए उन्हें ग्रैमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।

इक परी के साथ मौजों पर…

मौत तू एक कविता है!

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मौत तू एक कविता है.

मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको,

डूबती नब्ज़ों में जब दर्द को नींद आने लगे

ज़र्द सा चेहरा लिये जब चांद उफक तक पहुँचे

दिन अभी पानी में हो, रात किनारे के करीब

ना अंधेरा ना उजाला हो, ना अभी रात ना दिन

जिस्म जब ख़त्म हो और रूह को जब साँस आए

मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको.

किताबें !

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किताबें झाँकती हैं बंद आलमारी के शीशों से,

बड़ी हसरत से तकती हैं.

महीनों अब मुलाकातें नहीं होतीं,

जो शामें इन की सोहबत में कटा करती थीं.

अब अक्सर …….

गुज़र जाती हैं ‘कम्प्यूटर’ के पदों पर.

बड़ी बेचैन रहती हैं किताबें ….

इन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है

बड़ी हसरत से तकती हैं,

जो क़दरें वो सुनाती थीं,

कि जिनके ‘सेल’ कभी मरते नहीं थे,

वो क़दरें अब नज़र आतीं नहीं घर में,

जो रिश्ते वो सुनाती थीं.

वह सारे उधड़े-उधड़े हैं,

कोई सफ़ा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है,

कई लफ़्ज़ों के मानी गिर पड़े हैं.

बिना पत्तों के सूखे ठूँठ लगते हैं वो सब अल्फ़ाज़,

जिन पर अब कोई मानी नहीं उगते,

बहुत-सी इस्तलाहें हैं,

जो मिट्टी के सकोरों की तरह बिखरी पड़ी हैं,

गिलासों ने उन्हें मतरूक कर डाला.

ज़ुबान पर ज़ायका आता था जो सफ्हे पलटने का,

अब ऊँगली ‘क्लिक’ करने से बस इक,

झपकी गुज़रती है,

बहुत कुछ तह-ब-तह खुलता चला जाता है परदे पर,

किताबों से जो ज़ाती राब्ता था, कट गया है.

कभी सीने पे रख के लेट जाते थे,

कभी गोदी में लेते थे,

कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बना कर.

नीम-सजदे में पढ़ा करते थे, छूते थे जबीं से,

वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइन्दा भी.

मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल,

और महके हुए रुक्क़े,

किताबें माँगने, गिरने, उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे,

उनका क्या होगा ?

वो शायद अब नहीं होंगे !

अशोक चक्रधर की मजेदार कविताएं

अमलतास

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खिड़की पिछवाड़े को खुलती तो नज़र आता था,

वो अमलतास का इक पेड़, ज़रा दूर, अकेला-सा खड़ा था,

शाखें पंखों की तरह खोले हुए.

एक परिन्दे की तरह,

बरगलाते थे उसे रोज़ परिन्दे आकर,

सब सुनाते थे वि परवाज़ के क़िस्से उसको,

और दिखाते थे उसे उड़ के, क़लाबाज़ियाँ खा के,

बदलियाँ छू के बताते थे, मज़े ठंडी हवा के!

आंधी का हाथ पकड़ कर शायद.

उसने कल उड़ने की कोशिश की थी,

औंधे मुँह बीच-सड़क आके गिरा है!!

देखो, आहिस्ता चलो!

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देखो, आहिस्ता चलो, और भी आहिस्ता ज़रा,

देखना, सोच-सँभल कर ज़रा पाँव रखना,

ज़ोर से बज न उठे पैरों की आवाज़ कहीं.

काँच के ख़्वाब हैं बिखरे हुए तन्हाई में,

ख़्वाब टूटे न कोई, जाग न जाये देखो,

जाग जायेगा कोई ख़्वाब तो मर जाएगा.

पढ़ें ‘नागार्जुन’ की प्रतिनिधि कविताएं

ख़ुदा

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पूरे का पूरा आकाश घुमा कर बाज़ी देखी मैंने

काले घर में सूरज रख के,

तुमने शायद सोचा था, मेरे सब मोहरे पिट जायेंगे,

मैंने एक चिराग़ जला कर,

अपना रस्ता खोल लिया.

तुमने एक समन्दर हाथ में ले कर, मुझ पर ठेल दिया.

मैंने नूह की कश्ती उसके ऊपर रख दी,

काल चला तुमने और मेरी जानिब देखा,

मैंने काल को तोड़ क़े लम्हा-लम्हा जीना सीख लिया.

मेरी ख़ुदी को तुमने चन्द चमत्कारों से मारना चाहा,

मेरे इक प्यादे ने तेरा चाँद का मोहरा मार लिया

मौत की शह दे कर तुमने समझा अब तो मात हुई,

मैंने जिस्म का ख़ोल उतार क़े सौंप दिया,

और रूह बचा ली,

पूरे-का-पूरा आकाश घुमा कर अब तुम देखो बाज़ी|

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