एक सक्षम अभिनेत्री की प्रभावकारी कलम

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दीप्ति नवल (Best Poems Of Deepti Naval) ने जब अपने कैरियर की शुरुआत की, तब आर्ट फिल्में अपनी जगह बॉलीवुड में बना रही थीं । उन फिल्मों में अपनी एक अलग पहचान बनाने वाली एक्ट्रेसेज में दीप्ति नवल का नाम शामिल है| दीप्ति का डेब्यू 1978 में श्याम बेनेगल की फिल्म जूनून से हुआ, और उसके बाद उन्होंने हम पाँच, एक बार फिर जैसी फिल्मों में काम कर के अपनी एक पहचान बनायी। वे कविताएं भी लिखती थीं| उनका एक कविता संग्रह लम्हा-लम्हा भी छप चुका है|

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1

रेगिस्तान की रात है
और आँधियाँ से
बनते जाते हैं निशां
मिटते जाते हैं निशां

दो अकेले से क़दम
ना कोई रहनुमां
ना कोई हमसफ़र

रेत के सीने में दफ्न हैं
ख़्वाबों की नर्म साँसें
यह घुटी-घुटी सी नर्म साँसें ख़्वाबों की
थके-थके दो क़दमों का सहारा लिए
ढूँढ़ती फिरती हैं
सूखे बयाबानों में
शायद कहीं कोई साहिल मिल जाए

रात के आख़री पहर से लिपटे इन ख़्वाबों से
इन भटकते क़दमों से
इन उखड़ती सांसों से
कोई तो कह दो !
भला रेत के सीने में कहीं साहिल होते हैं ।

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2

मैंने देखा है दूर कहीं पर्बतों के पेड़ों पर
शाम जब चुपके से बसेरा कर ले
और बकिरयों का झुंड लिए कोई चरवाहा
कच्ची-कच्ची पगडंडियों से होकर
पहाड़ के नीचे उतरता हो

मैंने देखा है जब ढलानों पे साए-से उमड़ने लगें
और नीचे घाटी में
वो अकेला-सा बरसाती चश्मा
छुपते सूरज को छू लेने के लिए भागे

हाँ, देखा है ऐसे में और सुना भी है
इन गहरी ठंडी वादियों में गूँजता हुआ कहीं पर
बाँसुरी का सुर कोई़…

तब
यूँ ही किसी चोटी पर
देवदार के पेड़ के नीचे खड़े-खड़े
मैंने दिन को रात में बदलते हुए देखा है!

प्रेरणा पुरुष Ravindra Jain के चुनिंदा गीत और ग़ज़ल

“बहुत घुटी-घुटी रहती हो…
बस खुलती नहीं हो तुम!”
खुलने के लिए जानते हो
बहुत से साल पीछे जाना होगा
और फिर वही से चलना होगा
जहाँ से कांधे पे बस्ता उठाकर
स्कूल जाना शुरू किया था
इस ज़ेहन को बदलकर
कोई नया ज़ेहन लगवाना होगा
और इस सबके बाद जिस रोज़
खुलकर
खिलखिलाकर
ठहाका लगाकर
किसी बात पे जब हँसूंगी
तब पहचानोगे क्या?

4

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लोग एक ही नज़र से देखते हैं
औरत और मर्द
के रिश्ते को
क्योंकि उसे नाम दे सकते हैं ना!
नामों से बँधे
बेचारे यह लोग!

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