जब संतावनि के रारि भइलि बीरन के बीर पुकार भइलि

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जब संतावनि के रारि भइलि
बीरन के बीर पुकार भइलि
बलिया का मंगल पांडे के
बलिवेदी से ललकार भइलि
‘मंगल’ मस्ती में चूर चलल
पहिला बागी मशहूर चलल
गोरन का पलटनि का आगे
बलिया के बांका शूर चलल

जब चिता–राख चिनगारी से
धुधुकत तनिकी अंगारी से
शोला नकलल, धधकल फइलल
बलिया का कांति–पुजारी से
घर–घर में ऐसन आगि लगलि
भारत के सूतल भागि जगलि
बिगड़लि बागी पलटनि कााली
जब चललि ठोकि आगे ताली

टोली चढ़ि चलल जवानन के
मद में मातल मरदानन के
भरि गइल बहादुर बागिन से
कोना–कोना मयदानन के
ऐसन सेना सैलानी ले
दीवानी मस्त तुफानी ले
आइल रन में रिपु का आगे
जब कुंवर सिंह सेनानी ले

खच खच खंजर तरुवारि चललि
संगीन कृपान कटारि चलिल
बर्छी बरछा का बरखा से
बहि तुरत लहू के धारि चललि
बंदूक दगलि दन् दनन् दनन्
गोली दउरालि सन सनन् सनन्
भाला बल्लभ तेगा तब्बर
बजि उठल उहां खन खनन् खनन्

खउलल तब खून किसानन के
जागल जब जोश जवानन के
छक्का छूटल अंगरेजनि के
गोरे–गोरे कपतानन के
तनिकी–सा दूर किनार रहल
भारत के बेड़ा पार रहल
लउकत खूनी दरिआव पार
मंजिल के छोर हमार रहल

(साभार: प्रसिद्ध नारायण सिंह द्वारा लिखित कविता “विद्रोह”)

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